NDLS. डिजिटल इंडिया और फुलप्रूफ ई-टेंडरिंग व्यवस्था के बड़े-बड़े दावों के बीच भारतीय रेल में तकनीकी गोपनीयता को हाईजैक करने वाले एक बेहद शातिर सिंडिकेट का सीबीआई ने खुलासा किया है.
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (AC-III, नई दिल्ली) ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए उत्तर रेलवे के बड़ौदा हाउस स्थित मुख्यालय में चल रहे रिश्वतखोरी के खेल को बेनकाब कर दिया है.
सीबीआई ने मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की संबंधित धाराओं के तहत नियमित मुकदमा दर्ज किया है.
इस आपराधिक सिंडिकेट में उत्तर रेलवे के दो सीनियर अधिकारी, इनमें चीफ मटीरियल्स मैनेजर (स्टोर) नरेंद्र सिंह और डिप्टी चीफ मटीरियल्स मैनेजर (स्टोर) सुआशीष मैती सहित सीनियर क्लर्क लेनिन शर्मा और कानपुर की निजी चमड़ा कंपनी ‘मेसर्स मैश इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशकों समेत सात लोगों को नामजद किया गया है.
डिजिटल सिस्टम फेल: एडवांस बिडिंग और गोपनीय डेटा लीक
जांच में जो सबसे चौंकाने वाला पहलू सामने आया है, वह है पारदर्शी मानी जाने वाली ई-टेंडरिंग प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप और तकनीकी साठगांठ. आरोप है कि बड़ौदा हाउस में तैनात सीनियर क्लर्क लेनिन शर्मा इस सिंडिकेट का मुख्य ‘इनफॉर्मर’ था.
वह रिश्वत के एवज में कानपुर की कंपनी के निदेशक शारिक अली को रेलवे निविदाओं से जुड़ी बेहद संवेदनशील और पूरी तरह गोपनीय जानकारियां समय से पहले ही लीक कर रहा था.
इस तकनीकी सेंधमारी का फायदा उठाकर निजी कंपनी एडवांस बिडिंग (अग्रिम निविदा प्रपत्र) इस चतुराई से तैयार कर लेती थी कि हर हाल में टेंडर उसी को मिले. यह सीधे तौर पर सरकारी खरीद प्रणाली की निष्पक्षता को तकनीकी रूप से पंगु बनाने का मामला है.
टेंडर फिक्सिंग और 50% कोटे का खेल
सीबीआई की एफआईआर के मुताबिक, भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी थीं कि रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने निजी कंपनी को आश्वस्त किया था कि टेंडर हर हाल में उनकी झोली में ही गिरेगा.
अधिकारियों ने यहाँ तक सेटिंग कर रखी थी कि यदि तकनीकी पेच फंसा और टेंडर किसी अन्य कंपनी को चला भी गया, तो भी वे अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर कुल सप्लाई का न्यूनतम 50% कोटा नियमों को ताक पर रखकर मैश इंटरनेशनल को ही दिलाएंगे.
‘सेफ्टी शूज’ का सौदा और सीबीआई का ट्रैप
यह पूरा घोटाला रेलवे कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़े ‘सेफ्टी शूज’ के परचेज ऑर्डर से जुड़ा है. बीती 24 जून को उत्तर रेलवे के अधिकारियों ने मैश इंटरनेशनल के पक्ष में यह ऑर्डर जारी किया था. इसके तुरंत बाद घूस की रकम की पूरी लिस्ट तैयार की गई.
डील के मुताबिक, कंपनी का निदेशक शारिक अली मोटी रकम लेकर खुद दिल्ली डिलीवरी देने पहुंचा था, लेकिन सीबीआई की एडवांस इंटेलिजेंस और सतर्कता ने इस पूरी साजिश को रंगे हाथों नाकाम कर दिया.
सीबीआई के निशाने पर अधिकारी !
रेलवे का स्टोर और प्रोक्योरमेंट विभाग लगातार सीबीआई के रडार पर है. हाल के दिनों में विशाखापतनम के डीआरएम सौरभ प्रसाद (₹25 लाख घूस) और एनएफआर के सीएओ महेंद्र सिंह चौहान (₹1 करोड़ घूस) जैसे क्लास-1 अधिकारियों पर सीबीआई ने शिकंजा कसा है.
यह साफ करता है कि ऊपर से नीचे तक फैला यह भ्रष्टाचार देश के सबसे बड़े परिवहन तंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है. ऐसे में अब केवल एफआईआर नहीं, बल्कि अधिकारियों की संपत्ति कुर्की जैसी सख्त कार्रवाई की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है.
रेलहंट का प्रयास है कि सच रेल प्रशासन के सामने आये. ऐसे में किसी को अपना पक्ष रखना है तो whatsapp 9905460502 पर भेज सकते है, पूरे सम्मान के साथ उसका संज्ञान लिया जायेगा.
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