प्रतीक्षारत पोस्टिंग एक ऐसा खेल है, जिसमें खेलने वाले दोनों की मौज है. एक पोस्टिंग चाहने वाले- दूसरे पोस्टिंग करने वाले. यदि दोनों की आपसी सेटिंग हो गई तो दोनो की मौज है. यदि नहीं तो- बिना वेतन की पोस्टिंग की लंबी प्रतीक्षा . और यदि पोस्टिंग हो भी गई तो प्रतीक्षारत समय का वेतन पाने के लिए फिर वही लम्बा संघर्ष, जिसमें कर्मचारी जूता से चप्पल पर आ जाए और युवा से वृद्ध हो जाये और हो सकता है- सेवा से रिटायर हो भी जाये, फिर भी प्रतीक्षारत काल के वेतन की आश में प्राण न चली जाए.
आज की कहानी ऐसे ही एक मामले की है. पर कहानी पर बाद में आते हैं, पहले प्रतीक्षा- प्राप्ति का खेल खेलने का तरीका जान लेते हैं. बिहार के बहुत सारे निवासी अलग अलग प्रदेशों में विभिन्न रेलवे में काम करते हैं. सबको अपने गृह प्रदेश में आने की इच्छा होती है, पर, सबको यह सौभाग्य प्राप्त नहीं होता. कुछ पैरवी- पुत्र इसमें सफल हो ECR आ जाते हैं. आने वाले अपने कैडर में रिपोर्ट नहीं करते बल्कि उन्हें क्रूर कार्मिक विभाग में किसी बाबु के पास रिपोर्ट करना होता है और यहीं से प्रतीक्षा-प्रतीक्षा और प्रतीक्षा से प्राप्ति का खेल अलग अलग चरणों में प्रारम्भ हो जाता है.
यह है रेलवे का अकर्मण्य ” कार्मिक विभाग”, इनके बाबुओं के आगे बड़े अधिकारी भी लाचार !
आने वाले कर्मी को रिपोर्ट करने के बाद उस ऑफिस में हर रोज उपस्थिति देनी होती है. इस क्रिया से दोनों बचना चाहते हैं.कर्मचारी को अपने घर जाना होता है, सो वह बाबु का हाथ गरम कर चला जाता है और बाबु ज्वाइनिंग रिपोर्ट को दबा कर बैठ जाता है.
जिसने हाथ गरम नहीं किया, बाबु उसके ज्वाइनिंग रिपोर्ट पर बैठ जाता है और कर्मचारी को ऑफिस में हाजिरी देने को कह देता है, हाजिरी कहीं किसी काग़ज़ पर नहीं बनतीं, पर बाबु के सामने देना होता है. बाबू उस आदमी को इंतजार कराते थका देता है , काग़ज़ में कमी निकालता है. थकान मिटाने को हाथ गरम करवाता है. फ़िर फ़ाइल को OS, APO, SPO,Dy CPO, PCPO के यहाँ से गुजरने और गुजरबाने में महिनों लग जाता है.
और, फिर शुरू होता है हर कदम पर फाइल को रोकने या आगे बढ़ाने के लिए लेने – देने का खेल शुरु हो जाता है. प्रतीक्षारत रहने की समयावधि किसी कोड में नहीं लिखा है,अतः यह लम्बी चलती है. इससे होने वाले मानव दिवस के नुकसान और रेलवे के वित्तीय नुकसान से किसी को कोई मतलब नहीं.
PCPO होते हुए फ़ाइल PHOD तक और फिर HOD और नीचे JAG तक फाइल घूमती है और एक फुल सर्कल पूरा करती है.
इसी बीच कर्मचारी के मनचाहा मंडल या महत्वपूर्ण पोस्टिंग को लेकर भी सौदेबाजी होती है. मनचाही जगह खाली होने से भी खाली नहीं बताने का खेल और फिर मनचाही उगाही. और सब जगह उगाही हो जाने के बाद प्रतीक्षा समाप्त होती है. फ़िर पोस्टिंग आदेश में प्रतीक्षा अवधि को प्रक्रियागत अवधि बताकर पूर्ण वेतन का भुगतान का जिक्र कर दिया जाता है.
इस प्रक्रिया का खेल मंडल कार्यालय में भी होता है- कार्मिक के खड़ूस खिलाड़ियों के द्वारा. पिसता है कर्मचारी और घाटा उठाता है रेलवे. हाथ गरम नहीं करने वाले के हाथ में ठन- ठन गोपाल.
ऐसे ही एक संगीन मामले की वास्तविक कहानी अगले अंक में …
सफ़र जारी है..
रंजीत मिश्रा का व्यंग, लेखक railwellwishers के संपादक हैं
















































































