आज आदिवासी समाज के भीतर सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक प्रश्नों में से एक यह है कि क्या धर्म परिवर्तन के बाद भी आदिवासी पहचान उसी रूप में बनी रहती है, जिस रूप में वह धर्म परिवर्तन से पूर्व थी. विशेष रूप से रूढ़िवादी या पारंपरिक आदिवासी समुदायों और ईसाई आदिवासियों के बीच यह बहस लगातार गहराती जा रही है.
पारंपरिक आदिवासी समाज की पहचान केवल उसकी जातीय उत्पत्ति से नहीं, बल्कि उसकी प्रकृति-पूजक आस्था, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, लोकदेवताओं, सामुदायिक अनुष्ठानों, पारंपरिक पर्वों और जीवन-दर्शन से निर्मित होती है. आदिवासी समाज का धर्म, संस्कृति और सामाजिक जीवन एक-दूसरे से पृथक नहीं होते, बल्कि एक समग्र इकाई के रूप में कार्य करते हैं. इसलिए जब किसी आदिवासी समुदाय का एक भाग ईसाई धर्म स्वीकार करता है, तो परिवर्तन केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहता.
ईसाई धर्म अपनाने के बाद व्यक्ति चर्च-केंद्रित धार्मिक जीवन की ओर अग्रसर होता है. उसके धार्मिक प्रतीक, धार्मिक ग्रंथ, आध्यात्मिक आदर्श और पूजा-पद्धति बदल जाते हैं. समय के साथ उसके त्योहारों, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं में भी परिवर्तन दिखाई देने लगता है. यह परिवर्तन तुरंत नहीं होता, बल्कि पीढ़ियों के दौरान क्रमशः विकसित होता है.
यही कारण है कि आज एक रूढ़िवादी आदिवासी और एक ईसाई आदिवासी के बीच समानताएँ अपेक्षाकृत कम और भिन्नताएँ अधिक दिखाई देती हैं. दोनों का वंश एक हो सकता है, पूर्वज समान हो सकते हैं और कभी-कभी भाषा भी समान हो सकती है, किंतु उनकी धार्मिक चेतना, सामाजिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ भिन्न हो जाती हैं. एक समुदाय जहाँ प्रकृति, वन, पर्वत, नदी और पूर्वजों से जुड़े पारंपरिक अनुष्ठानों को अपनी पहचान का आधार मानता है, वहीं दूसरा समुदाय बाइबिल और चर्च पर आधारित धार्मिक जीवन का अनुसरण करता है.
कुछ लोग तर्क देते हैं कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आदिवासी पहचान बनी रहती है क्योंकि भाषा, वंश और कुछ सांस्कृतिक तत्व शेष रहते हैं. यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है. किंतु प्रश्न यह है कि क्या ये तत्व स्थायी रूप से अपरिवर्तित रहते हैं? इतिहास का अध्ययन बताता है कि ऐसा प्रायः नहीं होता. धार्मिक परिवर्तन के साथ सांस्कृतिक परिवर्तन भी धीरे-धीरे आगे बढ़ता है. जो तत्व प्रारंभ में सुरक्षित दिखाई देते हैं, वे भी समय के साथ नए धार्मिक परिवेश के प्रभाव में बदलने लगते हैं.
ईरान का उदाहरण इस संदर्भ में अक्सर दिया जाता है. प्राचीन परशिया की पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, किंतु आज के ईरान की सामूहिक पहचान पर इस्लामी प्रभाव स्पष्ट रूप से प्रमुख है. कुछ प्राचीन परंपराएँ बची रहीं, लेकिन समाज की मुख्य धारा नए धार्मिक ढाँचे के अनुरूप परिवर्तित हो गई. इससे यह सिद्ध होता है कि सांस्कृतिक अवशेषों का अस्तित्व और मूल पहचान का संरक्षण एक ही बात नहीं है.
इसी प्रकार यदि किसी आदिवासी समुदाय में व्यापक स्तर पर धर्म परिवर्तन होता है, तो उसकी पारंपरिक सांस्कृतिक संरचना पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है. प्रारंभ में भाषा, लोकनृत्य या कुछ सामाजिक परंपराएँ बनी रह सकती हैं, किंतु नई पीढ़ियों की धार्मिक और सांस्कृतिक प्राथमिकताएँ बदलने लगती हैं. परिणामस्वरूप समुदाय की सामूहिक चेतना भी नए स्वरूप की ओर अग्रसर होती है.
इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठता है कि यदि एक ईसाई आदिवासी और एक पारंपरिक आदिवासी की पूजा-पद्धति, धार्मिक आस्था, जीवन-दर्शन, सामाजिक संस्कार और सांस्कृतिक आदर्श अलग-अलग हो चुके हैं, तो दोनों की पहचान को पूर्णतः समान कैसे माना जाए? यह प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सभ्यतागत विमर्श का भी विषय है.
इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्म परिवर्तन के साथ हर पारंपरिक तत्व तुरंत समाप्त हो जाता है. वास्तविकता यह है कि परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है. कुछ तत्व शीघ्र बदलते हैं, कुछ देर से बदलते हैं और कुछ लंबे समय तक बने रहते हैं. किंतु यदि धर्म किसी समुदाय की पहचान का केंद्रीय आधार है, तो उसमें परिवर्तन होने पर मौलिक सांस्कृतिक पहचान भी प्रभावित होती है. प्रभाव की मात्रा भिन्न हो सकती है, लेकिन प्रभाव का अस्तित्व लगभग अनिवार्य है.
अतः यह कहा जा सकता है कि रूढ़िवादी आदिवासी और ईसाई आदिवासी के बीच केवल धार्मिक अंतर नहीं है, बल्कि समय के साथ सांस्कृतिक और सभ्यतागत अंतर भी विकसित होता है. इस अंतर की गहराई स्थान, समय और परिस्थितियों के अनुसार कम या अधिक हो सकती है, किंतु यह मान लेना कठिन है कि धर्म परिवर्तन के बावजूद मूल पहचान पूरी तरह अपरिवर्तित बनी रहती है.
अजय कुमार झा ( हर हर जी )
(लेखक रेलवे यूनियन से जुड़े हैं और यह उनके स्वतंत्र एवं निजी विचार हैं)




















































































