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खुला मंच/विचार

रेत से इंटरनेट तक 3500 वर्षों की ‘कांच-यात्रा’ और अमेरिका का अद्भुत ‘कॉर्निंग म्यूज़ियम ऑफ़ ग्लास’

अमेरिका के न्यूयॉर्क, कॉर्निंग से वीरेंद्र कुमार पालीवाल

‘कांच’ एक ऐसा साधारण सा शब्द जिसे हम रोज़ सुनते और देखते हैं, पर शायद ही कभी उसके पीछे छिपे विज्ञान, कला और हज़ारों वर्षों के अद्भुत सफ़र के बारे में मन में विचार आया हो . सुबह उठकर खिड़की से बाहर झाँकना, चश्मा लगाना, चाय का गिलास उठाना, मोबाइल की स्क्रीन छूना इन सबमें है ‘काँच’ और यही ‘काँच’ आज हज़ारों किलोमीटर दूर तक प्रकाश की गति से डेटा पहुँचाने वाले ऑप्टिकल फाइबर में भी है. इन दोनों छोरों के बीच की यात्रा रेत से इंटरनेट तक 3500 वर्ष लम्बी है.

इस पूरी यात्रा को मैंने हाल ही में अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य के एक छोटे से नगर कॉर्निंग में स्थित विश्वविख्यात ‘कॉर्निंग ग्लास संग्रहालय’ में साक्षात अनुभव किया. यह संग्रहालय केवल कांच का नहीं, बल्कि मानव जिज्ञासा, विज्ञान और कला के सम्मिलन का एक जीवंत दस्तावेज़ है.

इतिहास के झरोखे से : जब रेत बनी पारदर्शी पारसमणि

मानव इतिहास में काँच का निर्माण लगभग 3,500 वर्ष पहले मेसोपोटामिया और प्राचीन मिस्र में प्रारम्भ हुआ. उस समय का काँच आज जैसा पारदर्शी नहीं था , वह धुँधला, रंगीन और प्रायः अपारदर्शी होता था. उसका उपयोग आभूषणों, मनकों और सुगंधित तेल रखने के छोटे पात्रों में होता था. केवल राजा-महाराजाओं और सम्पन्न वर्ग के पास इसे रखने का सौभाग्य था.

रोमन साम्राज्य के काल में एक क्रांतिकारी खोज हुई , कांच फूँकने (Glass Blowing) की तकनीक. पिघले हुए काँच को लोहे की नली से फूँककर मनचाहा आकार देना सम्भव हुआ. इस एक खोज ने काँच को विलासिता से निकालकर आम जीवन में पहुँचा दिया.

मध्यकाल में इटली के मुरानो द्वीप के कारीगरों ने काँच को पूरी तरह पारदर्शी बनाने का फॉर्मूला खोज निकाला, जिसे ‘क्रिस्टलो’ कहा गया. यह विज्ञान और कला का ऐसा अनूठा संगम था जिसने आगे चलकर दूरबीन और सूक्ष्मदर्शी का मार्ग प्रशस्त किया. यदि काँच पारदर्शी न होता, तो गैलीलियो ब्रह्माण्ड को न देख पाते और लुई पाश्चर सूक्ष्म जीवाणुओं की दुनिया नहीं खोज पाते.

विज्ञान का जादू : काँच कैसे बनता है?

जब साधारण रेत ‘सिलिका’ सोडा ऐश और चूने के पत्थर को लगभग 1,700 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पिघलाया जाता है और फिर अचानक ठंडा किया जाता है, तो परमाणुओं को व्यवस्थित क्रिस्टल संरचना बनाने का समय नहीं मिलता. परिणामस्वरूप यह तरल जैसी आणविक अव्यवस्था के साथ ठोस रूप ले लेता है और यही इसकी पारदर्शिता का रहस्य है.

कांच का तीर्थस्थान : कॉर्निंग म्यूज़ियम ऑफ़ ग्लास

न्यूयॉर्क प्रान्त के सुंदर स्ट्यूबेन काउंटी क्षेत्र में बसे कॉर्निंग टाउन में पैर रखते ही समझ आता है कि इसे ‘काँच का शहर’ क्यों कहा जाता है .वर्ष 1951 में कॉर्निंग ग्लास वर्क्स (आज का कॉर्निंग इन्कॉर्पोरेटेड) ने अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष के अवसर पर इस संग्रहालय को अपने राष्ट्र को समर्पित किया था. आज यह दुनिया का सबसे बड़ा और सर्वाधिक व्यापक काँच संग्रहालय है, जहाँ 50,000 से अधिक ऐतिहासिक और आधुनिक कलाकृतियाँ संरक्षित हैं और प्रतिवर्ष तीन लाख से अधिक दर्शक आते हैं.

संग्रहालय में प्रवेश करते ही लगता है कि काँच की 3,500 वर्षों की यात्रा आपकी आँखों के सामने सजीव हो उठी हो. यहाँ प्राचीन मिस्र के फ़िरौन के समय के काँच के पात्रों से लेकर आधुनिक अंतरिक्ष दूरबीनों के लेंस तक सब कुछ एक ही छत के नीचे देखा जा सकता है. काँच के इतिहास, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में रूचि रखने वाले वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और इस छात्रों के लिए दुनिया में इससे बड़ा तीर्थ स्थल दूसरा नहीं हो सकता .

संग्रहालय में दर्शनीय हैं-

1) प्राचीन सभ्यताओं की गैलरी – मिस्र, रोम, इस्लामी जगत, यूरोप और एशिया के दुर्लभ काँच पात्र, आभूषण और कलाकृतियाँ यहाँ प्रदर्शित हैं. कुछ वस्तुएँ हज़ारों वर्ष पुरानी हैं और आश्चर्यजनक रूप से आज भी अपनी चमक बनाए हुए हैं. यह देखकर मन में एक विचार आता है : काँच नश्वर नहीं होता, वह इतिहास को अपने भीतर संजोए रखता है. 2) लाइव ग्लास ब्लोइंग — आग और साँस का जादू

2) संग्रहालय का सबसे रोमाँचकारी अनुभव वहाँ का एम्फीथिएटर हॉट शॉप — दुनिया की सबसे बड़ी काँच निर्माण प्रदर्शनी दीर्घाओं में से एक. यहाँ कुशल कारीगर 1,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर पिघले हुए लाल-तप्त काँच को लोहे की नली की सहायता से बाहर निकालते हैं और फिर अपनी साँस की फूँक और हाथों की कला से उसे एक सुंदर हंस, फूलदान या आधुनिक कलाकृति में ढाल देते हैं. यह देखना विस्मयकारी है कि जो पदार्थ जरा-सी चोट से टूट जाता है, वह पिघली अवस्था में कितना लचीला और कोमल हो सकता है. आप चाहें तो ‘Make Your Own Glass’ सत्र में स्वयं भी हाथ आज़मा सकते हैं — बिना किसी पूर्व अनुभव के.

3) इनोवेशन सेंटर — जहाँ विज्ञान की कहानी जीवंत होती है

यह वह स्थान है जहाँ काँच की वैज्ञानिक यात्रा दिखाई जाती है. थॉमस एडिसन के पहले बिजली के बल्ब के काँच के आवरण से लेकर टेलीविजन स्क्रीन, प्रयोगशाला के उपकरणों और आधुनिक फाइबर ऑप्टिक्स तक , हर नवाचार की कहानी यहाँ जीवंत रूप में प्रस्तुत है. यह जानकर हैरानी होती है कि एडिसन का वह ऐतिहासिक बल्ब जिसने दुनिया को पहली बार बिजली की रोशनी दी, उसका काँच का आवरण भी कॉर्निंग की प्रयोगशाला में तैयार हुआ था.
4. राको रिसर्च लाइब्रेरी — दुनिया का सबसे बड़ा कांच-ज्ञान केंद्र

यहाँ की राको रिसर्च लाइब्रेरी काँच की कला, इतिहास और विज्ञान पर दुनिया का सबसे बड़ा संसाधन केंद्र है. 230 से अधिक पांडुलिपि संग्रह ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं. हर भाषा में, हर प्रारूप में काँच पर प्रकाशित हर सामग्री यहाँ संग्रहीत है.

5) गोरिल्ला ग्लास : वह काँच जो आपका मोबाइल बचाता है

जब मोबाइल हाथ से छूटकर गिरता है तो दिल बैठ जाता है , लेकिन अधिकांश बार स्क्रीन बच जाती है. इसका श्रेय जाता है कॉर्निंग के ‘गोरिल्ला ग्लास’ को. यह एक रासायनिक रूप से मज़बूत किया गया विशेष काँच है जिसमें साधारण सोडियम आयनों को रासायनिक प्रक्रिया द्वारा बड़े पोटेशियम आयनों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है. इससे काँच की सतह पर एक जबरदस्त संपीड़न दबाव (Compression) बनता है जो उसे झटके और खरोंच से बचाता है. आज दुनिया के अधिकांश स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप में यही काँच है.

6) ऑप्टिकल फाइबर : वह काँच जिसने इंटरनेट को जन्म दिया

काँच की सबसे क्रांतिकारी उपलब्धि है ऑप्टिकल फाइबर. 1970 में कॉर्निंग के तीन वैज्ञानिकों डॉ. रॉबर्ट मॉरर, पीटर शुल्ट्ज और डोनाल्ड केक ने दुनिया का पहला व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक ‘लो-लॉस ऑप्टिकल फाइबर’ विकसित किया. यह इंसानी बाल से भी पतला 100% शुद्ध काँच का एक तंतु होता है.
भौतिकी के ‘पूर्ण आंतरिक परावर्तन’ (Total Internal Reflection) के सिद्धांत पर काम करते हुए यह तंतु लेज़र प्रकाश के रूप में अरबों गीगाबाइट डेटा को बिना गति खोए हज़ारों किलोमीटर तक पहुँचा देता है. आज भारत के दूरदराज़ गाँवों तक जो इंटरनेट पहुँच रहा है, उसकी रीढ़ यही काँच का तंतु है. वीडियो कॉल, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल बैंकिंग — यह सब इसी ‘काँच के धागे’ की देन है. “जब रेत जैसी साधारण चीज़ विज्ञान की आँच में तपकर इंटरनेट की रीढ़ बन जाए, तो समझिए मानव जिज्ञासा की कोई सीमा नहीं.”

वह बाढ़ जिसे संग्रहालय ने जीत लिया

1972 में उष्णकटिबंधीय तूफान एग्नेस के कारण संग्रहालय में भीषण बाढ़ आई. पाँच फीट तक पानी भर गया और हज़ारों ऐतिहासिक वस्तुएँ तथा दुर्लभ पुस्तकें क्षतिग्रस्त हो गईं. लेकिन कर्मचारियों और विशेषज्ञों ने अथक परिश्रम से संग्रह को बचाया. बाद में संग्रहालय को ऊँचे स्तर पर पुनर्निर्मित किया गया. यह घटना बताती है कि काँच की तरह ही यह संस्थान भी अटूट है.

भारत और काँच का रिश्ता

भारत में भी काँच का इतिहास उतना ही पुराना और गौरवशाली है. मोहनजोदड़ो की सभ्यता में काँच के मनके मिले हैं.राजशाही दौर के शीश महल आज भी वास्तुकला के चमत्कार हैं. फिरोज़ाबाद आज भी काँच उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है. और आज भारत ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के विस्तार में विश्व के अग्रणी देशों में है. कॉर्निंग संग्रहालय देखने के बाद इस पूरे सफ़र को एक नई दृष्टि से समझा जा सकता है.

एक साधारण पदार्थ, असाधारण सभ्यता

कॉर्निंग म्यूज़ियम की यात्रा ने मुझे यह गहरा एहसास कराया कि विज्ञान की सबसे बड़ी सफलताएँ अक्सर साधारण सी दिखने वाली वस्तुओं में भी छिपी होती हैं. काँच ऐसा ही एक पदार्थ है जिसने मानव जीवन को देखने, समझने और जोड़ने का तरीका बदल दिया.

जब अगली बार आप खिड़की से बाहर झाँकें, चश्मा पहनें, मोबाइल की स्क्रीन स्पर्श करें या इंटरनेट का उपयोग करें तो एक पल के लिए रुकिए और याद करिए कि आप केवल काँच नहीं देख रहे हैं, आप 3,500 वर्षों की मानव प्रतिभा, जिज्ञासा और वैज्ञानिक नवाचार का परिणाम देख रहे हैं , और शायद यही कारण है कि कॉर्निंग का यह संग्रहालय केवल काँच का संग्रहालय नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की प्रगति का दर्पण है.

(यह लेखक के निजी विचार है, इससे रेलहंट का कोई सरोकार नहीं है.) 

Railhunt News Desk
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