- DDU का एक जादुई विभाग , जहां हर भ्रष्टाचार बन जाता है ‘सिस्टम’!
DDU. पूर्व मध्य रेलवे (ECR) का पंडित दीनदयाल उपाध्याय (DDU) मंडल इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर प्रशासनिक और विधिक गलियारों में गहरी चर्चा का विषय बना हुआ है. मंडल के टीआरएस/ऑपरेटिंग (TRS/OPTG) विभाग में स्थानीय स्तर पर ड्यूटी आवंटन और धड़ल्ले से हुए स्थानांतरणों (Transfers) को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
इस पूरे प्रशासनिक चक्रव्यूह के केंद्र में वरिष्ठ अधिकारी श्री अमन कुमार हैं, जिनकी ‘विशेष प्रबंधन शैली’ को जहां एक तरफ रेल प्रशासन द्वारा हाल ही में ‘जीएम अवार्ड’ (GM Award) से नवाजा गया, वहीं दूसरी तरफ सजग कर्मचारियों द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारियों पर सूचनाएं दबाने और पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाने के संगीन आरोप लग रहे हैं.
आरटीआई आवेदनों के जवाब में धारा 8(1)(j) और 8(1)(g) की आड़ लेकर सूचनाएं रोकने की इस प्रशासनिक कवायद ने अब सीधे तौर पर रेलवे की निष्पक्षता और जवाबदेही को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
प्रशासनिक विसंगतियों को सहज स्वीकार्यता में बदलना
कहते हैं कि कुशल प्रबंधन धूल को भी सोना बना देता है. साहब ने भी अपनी प्रशासनिक शैली से विभाग में उठने वाले कथित अनियमितताओं के सवालों को कुछ इस तरह प्रबंधित किया है कि देखने वाले दंग रह जाएं.
नियम-कायदे तो शायद सामान्य व्यवस्था के लिए होते हैं, साहब जैसी विशिष्ट कार्यप्रणाली के आगे नियम सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने वाली वस्तु बनकर रह गए हैं. इस विशेष प्रबंधन का प्रतिफल भी ऐसा मिला कि इतिहास रच गया.
इस कथित अद्भुत सामंजस्य और विशिष्ट कार्यशैली को देखते हुए खुद डीआरएम (DRM DDU) ने उनकी संस्तुति की, और देखते ही देखते साहब ‘जीएम अवार्ड’ (GM Award) के तगमे से नवाज दिए गए. आखिर इस प्रशासनिक चक्रव्यूह में पुरस्कार की संस्तुति तो लाजमी ही थी !
RTI : एक ही मंत्र, हर मर्ज का इलाज
पिछले एक साल में सजग कर्मचारियों और नागरिकों ने विभाग की कार्यप्रणाली के मद्देनजर सैकड़ों आरटीआई (RTI) आवेदन दाखिल किए. इनमें से अधिकांश आवेदन स्थानांतरण (Transfer) नीतियों और स्थानीय ड्यूटी आवंटन में अपनाई जा रही ‘विशेष व्यवस्था’ से संबंधित थे.
जागरूक वर्ग यह जानना चाहता था कि इन निर्णयों का वास्तविक आधार और प्रशासनिक मापदंड क्या हैं. लेकिन साहब की प्रशासनिक सूझबूझ के आगे बड़े-बड़े नियम भी ठहरते नजर नहीं आते. उन्होंने आरटीआई की विस्तृत नियमावली को जैसे अपने ही एक ढर्रे में समेट दिया है.
चाहे सवाल ट्रांसफर का हो, ड्यूटी का हो, या किसी प्रक्रियात्मक चूक का, साहब के पास हर प्रश्न का एक ही रेडीमेड जवाब होता है: RTI Act की धारा 8(1)(j) और 8(1)(g). उत्तर बिल्कुल तयशुदा मिलता है…यह सूचना व्यक्तिगत या तीसरे पक्ष से संबंधित है, अतः व्यापक जनहित के अभाव में इसे उपलब्ध नहीं कराया जा सकता.
व्यंग्य में लोग कहते हैं कि यदि कभी कोई आरटीआई में यह पूछ बैठे कि ‘आज सूरज किस दिशा से निकला?”, तो शायद उत्तर मिलेगा “सूचना तीसरे पक्ष से संबंधित है, अतः उपलब्ध नहीं कराई जा सकती.
गोपनीयता की आड़ में प्रशासनिक सुरक्षा
अब जागरूक वर्ग भी कितना नादान है! भला कोई जानबूझकर अपने ही निर्णयों को सवालों के घेरे में लाता है? जिस स्थानांतरण (Transfer) नीतियों और स्थानीय ड्यूटी आवंटन के ‘विशेष प्रबंधन’ से प्रशासनिक दबदबा और अनुकूलता की फसल काटी जा रही हो, उसके दस्तावेज आरटीआई के जरिए सार्वजनिक करके कोई अपनी ही व्यवस्था को असहज कैसे कर सकता है?
अगर साहब ने आरटीआई में हर नीति का वास्तविक सच और मापदंड उजागर कर दिया, तो उनके इस ‘विशेष प्रशासनिक चक्रव्यूह’ की प्रामाणिकता पर ही सवालिया निशान लग जाएगा. अपनी कार्यप्रणाली पर रेल-हित, कर्मचारी-हित और जन-हित का जो आवरण ओढ़ा रखा है, वह पल भर में हट जाएगा.
इसलिए, गोपनीयता का यह पर्दा बेहद जरूरी माना जा रहा है, ताकि व्यवस्था की यह ‘विशेष धारा’ यूं ही अनवरत बहती रहे, विसंगतियों पर पर्दा पड़ा रहे और अवॉर्ड्स की बौछार होती रहे.
नियमों का पालन हुआ है, तो अभिलेखों को सार्वजनिक करने में संकोच कैसा !
यदि स्थानांतरण और स्थानीय ड्यूटी निर्धारण में वास्तव में नियमों का पालन हुआ है, तो उससे संबंधित प्रशासनिक अभिलेखों को सार्वजनिक करने में संकोच कैसा? और यदि समस्त प्रक्रिया स्थापित मापदंडों के अनुरूप है, तो विधिक सूचनाएं साझा करने से परहेज़ क्यों? प्रशासनिक पारदर्शिता का सबसे बड़ा प्रमाण प्रामाणिक दस्तावेज होते हैं, न कि तकनीकी बहाने.
रेलवे की विडंबना देखिए कि जहां धरातल पर काम करने वाले एक लोको पायलट, गार्ड, स्टेशन मास्टर या तकनीशियन की छोटी-सी प्रक्रियात्मक चूक पर भी तुरंत जवाब-तलब और अनुशासनात्मक कार्रवाई हो जाती है, वहीं दूसरी ओर जब उच्च प्रशासनिक निर्णयों और नीतियों पर नीतिगत प्रश्न उठते हैं, तब जवाबदेही सुनिश्चित करने के स्थान पर आरटीआई की अपवाद धाराओं की ढाल सामने ला दी जाती है. यह दोहरा रवैया पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है.
‘सत्य को किसी पर्दे की आवश्यकता नहीं होती’
कहावत है “सत्य को किसी पर्दे की आवश्यकता नहीं होती”. यदि प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह निष्पक्ष और न्यायसंगत है, तो सूचनाओं के प्रकटीकरण में यह हिचकिचाहट क्यों? यदि हर नीतिगत प्रश्न का उत्तर केवल आरटीआई अधिनियम की अपवाद धाराओं के पीछे खोजा जाएगा, तो अधीनस्थ कर्मचारियों के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास और संदेह पैदा होना स्वाभाविक है.
आज आवश्यकता केवल पुरस्कारों और सम्मानों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक शुचिता और पारदर्शिता की है. कोई भी सम्मान तभी सार्थक और गौरवमयी होता है, जब उसके साथ संगठन और कर्मचारियों का अटूट विश्वास भी जुड़ा हो. अन्यथा प्रशासनिक इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ तात्कालिक पुरस्कारों की चमक समय की धूल में ओझल हो गई, लेकिन नीतिगत दस्तावेज और स्थापित सत्य हमेशा बोलते रहे.
रेल प्रशासन की वास्तविक साख नियमों को अलमारी में बंद रखने या चुनिंदा तरीके से लागू करने में नहीं, बल्कि उन्हें बिना किसी भेदभाव के समान रूप से क्रियान्वित करने में है. जिस दिन सूचनाएं साझा करने की यह प्रशासनिक हिचक समाप्त हो जाएगी, उसी दिन यह स्वतः सिद्ध हो जाएगा कि व्यवस्था सचमुच स्थापित नियमों से चलती है, किसी व्यक्ति विशेष की व्यक्तिगत प्राथमिकताओं से नहीं !
डीआरएम डीडीयू को इस मामले में संज्ञान लेकर तत्काल उचित कदम उठाना चाहिए ताकि आम लोग और रेलकर्मियों में व्यवस्था के पारदर्शिता को लेकर भ्रम की स्थिति दूर हो सके.
रेलहंट का प्रयास है कि सच रेल प्रशासन के सामने आये. ऐसे में किसी को अपना पक्ष रखना है तो whatsapp 9905460502 पर भेज सकते है, पूरे सम्मान के साथ उसका संज्ञान लिया जायेगा.
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