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ग्लोबल फ्यूल क्राइसिस की मार : भारतीय रेलवे ने डीजल इंजनों पर बढ़ाया ‘टैक्स’, कारोबारी जगत में खलबली!

NEW DELHI. अंतरराष्ट्रीय मंच पर गहराते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल के बाजार में मची चौतरफा उथल-पुथल का सीधा असर अब भारतीय पटरियों पर भी दिखने लगा है. वैश्विक ईंधन संकट (विशेषकर ईरान और मिडिल-ईस्ट में जारी तनाव) के दबाव में आकर भारतीय रेलवे ने अपने परिचालन तंत्र को संतुलित करने के लिए एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है.

रेलवे बोर्ड की ओर से जारी ताजा फरमान के तहत देश भर में मालगाड़ियों की शंटिंग और साइडिंग गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होने वाले डीजल इंजनों के किराए में सीधे बढ़ोतरी कर दी गई है. यह नया वित्तीय चाबुक आगामी 1 अगस्त 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो जाएगा.

माल ढुलाई होगी महंगी, कारोबारियों की जेब पर बढ़ा ‘पॉवर लोड’

रेलवे बोर्ड के इस नए फैसले ने सीधे तौर पर उन उद्योगपतियों, निजी पोर्ट संचालकों और कमर्शियल फर्मों की चिंता बढ़ा दी है, जो अपने भारी-भरकम माल को लोड या अनलोड कराने के लिए रेलवे से प्रति घंटे के हिसाब से डीजल इंजन किराए पर लेते हैं.

नए टैरिफ के मुताबिक, ब्रॉड गेज लाइनों पर दौड़ने वाले मुख्य डीजल इंजनों का किराया ₹17,560 प्रति घंटा से बढ़ाकर अब ₹17,740 प्रति घंटा कर दिया गया है. यानी अब उद्योगों को हर एक घंटे के शंटिंग ऑपरेशन के लिए ₹180 का अतिरिक्त भुगतान करना होगा.

दिखने में यह रकम भले ही छोटी लगे, लेकिन 24 घंटे चलने वाले बड़े औद्योगिक साइडिंग्स के लिए यह लाखों रुपये का अतिरिक्त मासिक बोझ बनने जा रहा है, जिससे अंततः लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई की लागत का बढ़ना तय माना जा रहा है.

‘ग्रीन रेलवे’ का दांव: इलेक्ट्रिक नेटवर्क को रखा अछूता

एक तरफ जहाँ रेलवे ने डीजल की बढ़ती कीमतों का बोझ ग्राहकों पर डाला है, वहीं दूसरी तरफ बेहद चालाकी से पर्यावरण-अनुकूल ‘इलेक्ट्रिक विंग’ को इस बढ़ोतरी से पूरी तरह बचा लिया है. रेलवे का संदेश साफ है—”डीजल छोड़ो, बिजली अपनाओ.”

बोर्ड ने साफ किया है कि ब्रॉड गेज पर चलने वाले इलेक्ट्रिक इंजनों का किराया बिना किसी बदलाव के ₹15,440 प्रति घंटा पर ही लॉक रहेगा. इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर उपयोग होने वाले छोटे डीजल शंटिंग इंजनों की दरों को भी ₹10,620 प्रति घंटा पर यथावत रखकर छोटे सेक्टर्स को थोड़ी राहत देने की कोशिश की गई है.

मजबूरी या रणनीति? क्यों रेलवे को उठाना पड़ा यह कदम

जानकारों की मानें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के कारण रेलवे की खुद की परिचालन लागत (Operational Cost) बजट से बाहर जा रही थी. ऐसे में वित्तीय घाटे को पाटने के लिए रेलवे के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं बचा था.

हालांकि, इस फैसले के पीछे रेलवे की एक सोची-समझी रणनीतिक चाल भी दिखाई देती है. रेलवे पिछले कुछ वर्षों से शत-प्रतिशत विद्युतीकरण (100% Electrification) के मिशन पर काम कर रहा है.

डीजल इंजनों को महंगा करके रेलवे अप्रत्यक्ष रूप से निजी कंपनियों और अपने मंडलों को इलेक्ट्रिक इंजनों के अधिकतम इस्तेमाल की तरफ धकेलना चाहता है. अब देखना यह है कि 1 अगस्त से लागू होने वाले इस फैसले के बाद देश का कमर्शियल मार्केट इस बढ़े हुए ‘पॉवर लोड’ को कैसे संभालता है.

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