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टाटानगर पार्सल सिंडिकेट की मनमानी के आगे चक्रधरपुर मंडल रेल प्रशासन नतमस्तक, पटरियों पर फेंके जा रहे बोरे!

  • हमसफर एक्सप्रेस में अनलोडिंग में सुरक्षा मानकों की अनदेखी, दो कर्मियों की मौजूदगी में पटरी की ओर उतारा गया पार्सल 
  • कथित साठगांठ के चलते सुरक्षा मानकों को ताक पर रखने की आशंका, आरपीएफ का मौन खड़े कर रहा गंभीर सवाल

TATANAGAR. टाटानगर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की जान और रेलवे की सुरक्षा को किस तरह दांव पर लगा दिया जाता है, इसका एक बार फिर से नया नजारा सामने आया है. चर्चा है कि चंद रुपयों के कथित कमीशन और साठगांठ के खेल में यहाँ नियमों को पूरी तरह मटियामेट कर दिया गया.

मामला मंगलवार सात जुलाई का है, जब हाई-स्पीड ‘हमसफर एक्सप्रेस’ के पार्सल को सीधे प्लेटफॉर्म पर उतारने की बजाय, दूसरी ओर नीचे रनिंग ट्रैक की ओर धड़ाधड़ फेंककर उतारा गया.

चौंकाने वाली बात यह रही कि यह आत्मघाती लापरवाही किसी से छिपकर नहीं, बल्कि पार्सल विभाग के जिम्मेदार कर्मचारियों की मौजूदगी में ऑन-कैमरा होती रही. ठेकेदार के मजदूर इस ‘अनसेफ अनलोडिंग’ के खेल को अंजाम देते रहे और प्रशासनिक स्तर पर अधिकारी इस गंभीर अनदेखी पर रहस्यमयी मौन साधे रहे.

नियमों को ताक पर रखकर उतारा गया पार्सल

सूत्रों के अनुसार जैसे ही मंगलवार की शाम हमसफर एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर दो पर आकर रुकी. दो पार्सल कर्मियों दिलीप सिंह और राजीव गोस्वामी की मौजूदगी में ठेकेदार के कर्मचारी एक्टिव थे. नियम के मुताबिक सभी पार्सल को सुरक्षित तरीके से प्लेटफॉर्म पर उतारकर ट्रॉली से ले जाना चाहिए.

लेकिन यहां लेबर चार्ज और समय बचाने के चक्कर में पार्सल के भारी-भरकम बोरों को सीधे रेलवे ट्रैक की ओर फेंका जाने लगा. आलम यह था कि इस घटना को कुछ रेल अधिकारी भी देख रहे थे लेकिन सुरक्षा की इस घोर अनदेखी पर उन्होंने अपनी आंखें मूंद लीं.

सूत्रों का दावा है कि पूर्व में कई गंभीर शिकायतों के बाद इन दोनों पार्सल कर्मियों को टाटानगर से हटा दिया गया था. लेकिन रहस्यमयी ढंग से ऊपरी स्तर से पैरवी के बाद इन्हें दोबारा इसी संवेदनशील जगह पर तैनात कर दिया गया. विभागीय सूत्रों की मानें तो इस री-पोस्टिंग के पीछे एक बड़ा रसूखदार सिंडिकेट काम कर रहा है.

‘काली कमाई’ और कमीशन के सिंडिकेट की आशंका

टाटानगर में पार्सल ओवरलोडिंग और नियमों की अनदेखी का मामला बीते दिनों भी काफी चर्चा में रहा था. रेल महकमे के जानकारों का कहना है कि सालों से चल रहे इस ढर्रे पर कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई करने की जगह, अक्सर विभागीय स्तर पर लीपापोती की रणनीति अपनाई जाती रही है.

विभागीय सूत्रों की मानें तो ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने और सुरक्षा नियमों को बाईपास करने के लिए कथित तौर पर बड़े पैमाने पर साठगांठ का खेल चलता है. आरोप है कि इसी कथित कमीशनबाजी और प्रशासनिक ढील के कारण जिम्मेदार कर्मचारी और अधिकारी इतने असुरक्षित और जानलेवा कार्यों को देखकर भी मौन साध लेते हैं.

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इस तरह पैसेंजर्स की सुरक्षा को पूरी तरह दांव पर लगा दिया गया है. तकनीकी और सुरक्षा मानकों के लिहाज से देखें तो यदि पार्सल फेंकने के दौरान उसी ट्रैक पर कोई दूसरी ट्रेन या इंजन आ जाता, तो एक भीषण हादसा हो सकता था. यही नहीं, रनिंग ट्रैक पर गिरे पार्सल से उलझकर स्वयं हमसफर एक्सप्रेस के बेपटरी (Derail) होने का भी गंभीर खतरा बना हुआ था.

150 से अधिक सीसीटीवी, सिर्फ चोर पकड़ने के लिए क्या !

रेलवे एक्ट के तहत रनिंग ट्रैक पर इस तरह सामान फेंकना या अनसेफ अनलोडिंग करना एक गंभीर और दंडनीय अपराध है, जिस पर आरपीएफ (RPF) को तत्काल सख्त एक्शन लेना चाहिए था. अब सवाल यह उठता है कि स्टेशन पर 150 से अधिक सीसीटीवी कैमरे की मौजूदगी क्या सिर्फ चोर पकड़ने के लिए है? एक आम यात्री अगर रेलवे ट्रैक पार कर ले तो आरपीएफ की बेचैनी बढ़ जाती और उसे पकड़कर जुर्माना लगा दिया जाता है तब पार्सल एजेंटों के इस कृत्य पर आरपीएफ का मौन क्यों है?

रेलहंट का प्रयास है कि सच रेल प्रशासन के सामने आये. ऐसे में किसी को अपना पक्ष रखना है तो whatsapp 9905460502 पर भेज सकते है, पूरे सम्मान के साथ उसका संज्ञान लिया जायेगा. 

Railhunt News Desk
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