NEW DELHI. भारतीय रेलवे, जिसे कभी देश की ‘लाइफलाइन’ कहा जाता था, इन दिनों अपनी पटरियों पर कम और प्रशासनिक ‘जुगाड़’ की पटरियों पर ज्यादा दौड़ रही है. वर्तमान मामला रेलवे बोर्ड के चेयरमैन के कार्यकाल विस्तार का है. सरकार पिछले तीन सालों से पूरी भारतीय रेलवे के लिए एक स्थाई और ‘योग्य’ चेयरमैन खोजने में नाकाम (शायद अनिच्छुक) रही है.
हर बार जब कार्यकाल समाप्त होने का वक्त आता है, सरकार को अचानक याद आता है कि नियमों को ‘शिथिल’ करके एक्सटेंशन देना ही सबसे बड़ा सुशासन है. हाल ही में जारी आदेश में मौजूदा चेयरमैन श्रीमान सतीश कुमार को फिर से एक साल का सेवा विस्तार (Re-employment) दे दिया गया है.
अब सवाल यह उठता है कि क्या 12 लाख से अधिक कर्मचारियों वाले इस विशाल संगठन में कोई एक भी ऐसा अधिकारी नहीं बचा जिसे रेलवे बोर्ड की कमान सौंपी जा सके? या फिर सरकार की मंशा ही यही है कि ‘अस्थायी और अपनी शर्तों पर’ काम करने वाले मुखिया के सहारे व्यवस्था को चलाया जाए?
रेलवे बोर्ड के मौजूदा चेयरमैन सतीश कुमार को मिला एक साल का यह सेवा विस्तार सिर्फ एक अधिकारी का कार्यकाल बढ़ना नहीं है, बल्कि इस बात की आधिकारिक मुहर है कि 100 से अधिक जनरल मैनेजर (GM) और प्रिंसिपल हेड (PHOD) वाले इस महकमे में सरकार को ‘नियमों को शिथिल’ किए बिना कोई और भरोसेमंद चेहरा नहीं मिल रहा है!
रेलवे बोर्ड चेयरमैन (CRB) सह सीईओ सतीश कुमार को मिला एक साल का सेवा विस्तार
जब मुखिया ही एक्सटेंशन पर हो, तो नीचे व्यवस्था कैसी होगी?
कहते हैं कि जब इमारत की नींव ही ढुलमुल हो, तो कमरों में सजावट का कोई मतलब नहीं रह जाता. आज विभिन्न रेल मंडलों (Zones) की स्थिति किसी से छिपी नहीं है.
- सीबीआई की ताबड़तोड़ छापेमारी: देश के अलग-अलग जोनों में सीबीआई आए दिन रेलवे अधिकारियों के परिसरों पर छापे मार रही है. रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि रेलवे की कार्यशैली का हिस्सा बनते दिख रहे हैं.
- फाइलों में कैद योजनाएं और धूल फांकती गुणवत्ता: कागजों में तो बुलेट ट्रेन और आधुनिक स्टेशनों के दावे चमचमा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर योजनाएं गुणवत्ता की कसौटी पर खरी उतरने से पहले ही धूल फांक रही हैं.
- टेंडर और ‘डेविएशन’ का खेल: रेल विकास के नाम पर जारी होने वाले टेंडरों में नियमों का विचलन (Deviation) एक आम बात बन चुकी है. पसंदीदा ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने और गुणवत्ता से समझौता करने का यह ‘वैध’ तरीका बन चुका है.
- अफसरों की मनमाने, नियम ताक पर : वर्तमान में आलम यह है कि ऊपर से नीचे से अफसरशाही के सारे रिकार्ड टूटे रहे. नियमों को ताक पर रखकर अधिकारी मनमानी कर रहे. मनचाहे लोगों को कुर्सी पर बैठाकर अपना उल्लू सीधा करने का खेल चल रहा है.

एयर-कंडीशंड मीटिंग रूम और बदहाल जमीनी हकीकत
आजकल रेलवे के आला अधिकारी ‘फील्ड विजिट’ करने से परहेज करते हैं. वातानुकूलित कमरों में बैठकर ‘ऑनलाइन मीटिंग्स’ के जरिए बड़े-बड़े दिशा-निर्देश जारी कर दिए जाते हैं. जमीन पर उतरकर आम यात्रियों और रेलकर्मियों की परेशानी देखने-समझने की जरूरत नहीं महसूस की जाती.
ऑनलाइन बैठकों में बनने वाली काल्पनिक योजनाएं जब धरातल पर उतरती हैं, तो वे आम यात्रियों के लिए राहत नहीं, बल्कि जी का जंजाल बन जाती हैं. ट्रेनों की लेट-लतीफी, बदहाल सफाई व्यवस्था, सुरक्षा में चूक और बोगियों में ठसाठस भरी भीड़ यह बताने के लिए काफी है कि ‘ऑनलाइन सुशासन’ और ‘ऑफलाइन हकीकत’ में कितना बड़ा फासला है.
मंशा पर सवाल: क्या जानबूझकर बनाया गया यह माहौल?
जब रेलवे बोर्ड जैसे सर्वोच्च पद के लिए तीन साल में एक योग्य उम्मीदवार नहीं मिलता, तो सरकार की नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
- क्या सरकार योग्य और कड़े फैसले लेने वाले अधिकारियों को शीर्ष पद पर नहीं देखना चाहती?
- क्या सेवा विस्तार (Extension) की यह रेवड़ी अधिकारियों को दबाव में रखने और अपनी बात मनवाने का जरिया बन चुकी है?
यदि सरकार सचमुच भारतीय रेलवे का कायाकल्प करना चाहती है, तो उसे ‘जुगाड़ और एक्सटेंशन’ की राजनीति से बाहर निकलना होगा. एक मजबूत, स्थाई और जवाबदेह नेतृत्व ही रेलवे को भ्रष्टाचार के इस दलदल से बाहर निकाल सकता है. वरना ‘वंदे भारत’ की चकाचौंध के पीछे आम यात्री यूं ही पिसता रहेगा और फाइलें ‘एक्सटेंशन’ के आदेशों से भरती रहेंगी.
क्या होता है ‘कांट्रैक्ट री-एंप्लॉयमेंट’, जो सतीश कुमार को मिला ?
साधारण भाषा में इसे ‘रिटायरमेंट के बाद संविदा पर दोबारा तैनाती’ कहा जाता है. जब कोई वरिष्ठ अधिकारी अपनी नियमित सेवानिवृत्ति पूरी कर लेता है, तो सेवा नियमों के तहत उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है. लेकिन सरकार विशेष शक्तियों का उपयोग करके (ACC की मंज़ूरी से) उन्हें एक या दो साल के ठेके (Contract) पर उसी या नए पद पर दोबारा नियुक्त करती है.
- अस्थायी स्थिति और ‘अपनी शर्तों पर’ काम: री-एंप्लॉयमेंट पर बैठा अधिकारी नियमित कैडर का हिस्सा नहीं रहता, बल्कि पूरी तरह सरकार के विशेष आदेश और शर्तों पर निर्भर होता है.
- कैडर का प्रमोशन ब्लॉक होना: जब शीर्ष पद पर किसी रिटायर अधिकारी को एक्सटेंशन दिया जाता है, तो उसके नीचे की लाइन में खड़े योग्य और वरिष्ठ अधिकारियों के पदोन्नति (Promotion) के अवसर हमेशा के लिए खत्म या टल जाते हैं.
- जवाबदेही और फैसलों में झिझक: संविदा पर तैनात प्रमुख का ध्यान दीर्घकालिक सुधारों से ज्यादा अपने कार्यकाल के सुरक्षित निपटारे पर रहता है, जिससे बड़े और कड़े प्रशासनिक फैसले लेने में हिचकिचाहट आती है.

















































































