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Home » PRAYAGRAJ : रेल में ‘खेल’: ₹50 हजार का ‘ट्रैप’ सिर्फ मोहरा, क्या तबादला सिंडिकेट के असली ‘खिलाड़ी’ तक पहुंचेगी CBI!
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PRAYAGRAJ : रेल में ‘खेल’: ₹50 हजार का ‘ट्रैप’ सिर्फ मोहरा, क्या तबादला सिंडिकेट के असली ‘खिलाड़ी’ तक पहुंचेगी CBI!

Railhunt News DeskBy Railhunt News DeskSeptember 12, 2026
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सांकेतिक तस्वीर AI
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PRAYAGRAJ. उत्तर मध्य रेलवे (NCR) प्रयागराज मंडल में ‘स्पाउस ग्राउंड’ (पति-पत्नी के एक साथ पदस्थापन) के नाम पर ₹50,000 की घूस लेते पकड़े गए सहायक कार्मिक अधिकारी (APO) अरविंद कुमार और कार्यालय अधीक्षक (OS) राजेंद्र मणि त्रिपाठी की गिरफ्तारी तो महज एक झांकी है. पर्दे के पीछे चल रहा असली खेल इससे कहीं बड़ा और गहरा है.

रेलवे प्रशासन के प्रशासनिक ढांचे को समझें तो साफ होता है कि गिरफ्तार किए गए दोनों कर्मचारी इस विशाल सिस्टम में सिर्फ ‘डाकिए’ या ‘मिडिल मैन’ की भूमिका निभा रहे थे. तबादले की नीति, मंजूरी और अंतिम फाइल पर मुहर लगाने की असली प्रशासनिक शक्ति (Power of Transfer) डिवीजन से जोनल स्तर के उच्च अधिकारियों या तयशुदा उच्च स्तरीय कमेटियों के पास सुरक्षित होती है. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या सीबीआई सिर्फ मोहरों को पकड़कर संतोष कर लेगी या फिर भ्रष्टाचार के इस पूरे ‘ट्रांसफर सिंडिकेट’ के आकाओं तक शिकंजा कसा जाएगा?

फाइलें अटकाने का ‘सिस्टम’ और बिचौलियों का नेटवर्क

प्रयागराज में घूसकांड की शुरुआत एक बेहद सामान्य मानवीय मांग से हुई थी. लोको पायलट पति-पत्नी ने नियम के तहत एक ही शहर में तैनाती के लिए आवेदन किया था. लेकिन रेलवे के प्रशासनिक गलियारों में नियम जितने स्पष्ट लिखे होते हैं, फाइलों की चाल उतनी ही धीमी कर दी जाती है.

  • आर्टिफिशिअल डिले (कृत्रिम देरी): किसी भी तबादले की फाइल को महीनों टेबल-दर-टेबल अटका कर रखा जाता है, ताकि आवेदक खुद थक-हारकर ‘चोर रास्ते’ की तलाश करने लगे.
  • मिडिल मैन की एंट्री: जैसे ही आवेदक परेशान होता है, निचले स्तर के कर्मचारी या दफ्तर के बाबू ‘समाधान निकालने’ के नाम पर मोलभाव शुरू करते हैं.
  • रेट लिस्ट का खेल: शुरुआत 70 हजार रुपये से हुई और सौदा 50 हजार में तय हुआ. यह रकम सिर्फ एक बाबू की जेब में जाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी चेन में बांटने के लिए तय की जाती है.

क्या छोटे अफसरों के पास होती है तबादले की पावर?

रेलवे के सर्विस रूल्स और प्रशासनिक व्यवस्था पर गौर करें तो APO या OS स्तर के कर्मचारियों के पास किसी भी कर्मचारी का तबादला खुद से मंजूर करने का कोई कानूनी या प्रशासनिक अधिकार नहीं होता:

  • भूमिका सिर्फ कागजी कार्रवाई तक: ये कर्मचारी केवल फाइलों को प्रोसेस करने, सर्विस रिकॉर्ड जांचने और ड्राफ्ट तैयार करने का काम करते हैं.
  • मंजूरी का अधिकार ऊपर: ट्रांसफर ऑर्डर पर हस्ताक्षर करने और अंतिम निर्णय लेने की शक्तियां वरिष्ठ अधिकारियों के पास होती हैं.
  • कट-मनी कल्चर: निचले स्तर के कर्मचारी आवेदक से घूस की रकम वसूलते हैं और अपना ‘कमीशन’ काटकर बाकी हिस्सा ऊपर तक पहुंचाते हैं.

इस व्यवस्था में गिरफ्तार हुए OS और APO केवल वसूली का माध्यम (Front-face) थे. असली गुनाहगार वे हैं जो अपने एसी कमरों में बैठकर इन फाइलों पर हरी झंडी देने के एवज में कट-मनी का इंतजार करते हैं.

रातों-रात डीआरएम दफ्तर का ताला खुलना, क्या मिले सुराग?

सीबीआई ने ट्रैप के तुरंत बाद जिस तरह आधी रात को डीआरएम (DRM) दफ्तर का ताला खुलवाकर मूल फाइलें और दस्तावेज जब्त किए, उससे साफ संकेत मिलता है कि जांच एजेंसी की नजर केवल इस एक मामले पर नहीं है.

  • कागजों में छिपे राज: जब्त की गई फाइलों से यह साफ होगा कि स्पाउस ग्राउंड और अन्य प्राथमिकताओं वाले तबादलों को जानबूझकर कितने दिनों तक दबाकर रखा गया.
  • डिजिटल और टेलीफोनिक ट्रेल: क्या पकड़े गए कर्मचारियों को ऊपर से फाइलें रोकने का कोई इशारा मिला था? सीबीआई अब कॉल डिटेल्स और व्हाट्सएप चैट के जरिए इस रैकेट के ऊपरी तार जोड़ने में जुटी है.

जोनल स्तर का भ्रष्टाचार, अब सीबीआई के सामने असली चुनौती

प्रयागराज घूसकांड ने रेलवे में जोनल और मंडल स्तर पर चल रहे ट्रांसफर-पोस्टिंग के व्यापार को बेनकाब कर दिया है. यदि सीबीआई इस मामले को केवल दो कर्मचारियों की गिरफ्तारी तक सीमित रखती है, तो यह ‘सिस्टम’ आगे भी इसी तरह काम करता रहेगा.

सीबीआई के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती उस पूरे सिंडिकेट को बेनकाब करने की है जो तबादलों के नाम पर मोटी रकम वसूलता है. जब तक ट्रांसफर की फाइल पर अंतिम दस्तखत करने वाले बड़े चेहरों से पूछताछ नहीं होगी और उनकी भूमिका की जांच नहीं की जाएगी, तब तक रेलवे में भ्रष्टाचार का यह दीमक खत्म नहीं होगा.

फिलहाल, 50 हजार रुपये की घूस के साथ पकड़े गए दोनों कर्मचारी जेल की सलाखों के पीछे हैं, लेकिन उत्तर मध्य रेलवे के गलियारों में अब यह सुगबुगाहट तेज है कि सीबीआई का अगला कदम किस ‘बड़े साहब’ की तरफ बढ़ेगा.

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