KOLKATA/TATA. दक्षिण पूर्व रेलवे मेंस यूनियन (SERMU) के लिए चक्रधरपुर महाधिवेशन कई मायनों में खास रहा है. संगठनात्मक औपचारिकता से अधिक इस अधिवेशन को बिगड़ते जमीनी राजनीतिक समीकरणों, खिसकते जनाधार और कर्मचारियों के बीच लगातार घटती साख के बीच, मेंस यूनियन की ‘खोई हुई राजनीतिक जमीन’ को वापस पाने की बड़ी छटपटाहट के रूप में देखा जा रहा है.
महाधिवेशन में ऑल इंडिया रेलवे फेडरेशन (AIRF) के राष्ट्रीय महासचिव शिवगोपाल मिश्रा ने रेलवे के निजीकरण और ठेकेदारी व्यवस्था के खिलाफ हुंकार तो भरी, लेकिन विडंबना यह है कि चक्रधरपुर मंडल में जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आती है. मंडल के रेल गलियारों में यह चर्चा आम है कि स्थानीय स्तर पर यूनियन के कुछ प्रतिनिधि और पदाधिकारी खुद ठेका व्यवस्था और आउटसोर्सिंग के चक्रव्यूह का हिस्सा बने हुए हैं.
ऐसे में ऑल इंडिया स्तर पर ‘ब्रांड शिवगोपाल’ का जो प्रभाव है, वह स्थानीय नेतृत्व की कार्यशैली और ढुलमुल रवैये के कारण पूरी तरह निष्प्रभावी होने का अनुमान लगाया जाने लगा है. चक्रधरपुर रेलमंडल में साधारण से लेकर निचले स्तर के कर्मचारियों के बीच जोन में एकलौते मान्यता प्राप्त दक्षिण पूर्व रेलवे मेंस यूनियन के नेताओं को लेकर भारी असंतोष और आक्रोश हैं.
कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग दबी जुबान आरोप लगा रहा है कि यूनियन प्रतिनिधियों की भूमिका अब कर्मचारियों के हक की लड़ाई लड़ने के बजाय रेल प्रशासन, स्थानीय अधिकारियों और ठेका एजेंसियों के बीच सामंजस्य (को-ऑर्डिनेशन) बिठाने तक सीमित रह गई है. यूनियन के कुछ पदाधिकारी कर्मचारी हितों की आड़ में निजी या व्यावसायिक तालमेल साध रहे हैं!
‘हाउस रेंट अलाउंस’ (HRA) से लेकर इंसेंटिव, समय पर पदोन्नति जैसी बुनियादी सुविधाएं दिलाने में जिस तरह के प्रशासनिक व्यवधान आ रहे हैं, उस पर स्थानीय नेतृत्व की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है. ऐसे में कहा जाने लगा है कि जब साधारण रेलकर्मी को अपनी जायज हक के लिए भी भटक रहा और यूनियन कार्यालय के चक्कर लगा रहा है तो यह मान लेना स्वाभाविक है कि स्थानीय नेतृत्व या तो अक्षम है या फिर उसकी निष्ठा कर्मचारियों के प्रति न होकर प्रबंधन के प्रति हो चुकी की है.
गुटबाजी का घुन, SERMU के आंतरिक बिखराव की मुख्य वजह
SERMU की लगातार गिरती साख और प्रभाव का सबसे बड़ा कारण संगठन के भीतर फैली गुटबाजी और आपसी खींचतान है. चक्रधरपुर मंडल में मेंस यूनियन कई गुटों में बंटी नजर आती है, जहां नेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने और अपनी-अपनी डफली बजाने में व्यस्त हैं. चक्रधरपुर महाधिवेशन के मंच से शिवगोपाल मिश्रा द्वारा अनुशासन और सबको साथ लेकर चलने का बार-बार आग्रह करना, खुद इस बात की तस्दीक करता है कि संगठन के अंदरूनी हालात ठीक नहीं हैं. जब शीर्ष नेता को ही मंच से एकजुटता की दुहाई देनी पड़े, तो समझा जा सकता है कि गुटबाजी का कैंसर कितना गहरा फैल चुका है.
‘ब्रांड शिवगोपाल’ का दांव, 20 साल के इंतजार के बाद क्या लौटेगा ‘खोया विश्वास’?
शिवगोपाल मिश्रा ने अपने संबोधन में स्वीकार किया कि वे लगभग 20 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद चक्रधरपुर पहुंचे हैं. रेलवे यूनियनों के विश्लेषकों का मानना है कि चक्रधरपुर मंडल में मेंस यूनियन का जो विशाल जनाधार पिछले कुछ वर्षों में खिसका है, उसे वापस समेटने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने आसन्न चुनाव से पहले ‘शिवगोपाल मिश्रा’ के सर्वमान्य चेहरे का इस्तेमाल एक आखिरी रणनीतिक दांव के रूप में किया है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल 20 साल बाद एक शीर्ष नेता का दौरा कर लेने या भावुक भाषण दे देने भर से स्थानीय स्तर पर फैली गुटबाजी, भ्रष्टाचार और दलाली के आरोपों को धोया जा सकता है?
रनिंग स्टाफ की नाराजगी, सीक्रेट बैलेट में उलटफेर करने का दम
चक्रधरपुर मंडल में ‘रनिंग स्टाफ’ (लोको पायलट, गार्ड आदि) और अन्य तकनीकी शाखाओं के कर्मचारी किसी भी यूनियन के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं. वर्तमान में रनिंग कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग स्थानीय नेतृत्व की कार्यप्रणाली से सख्त असंतुष्ट है. इस वर्ग का मानना है कि अत्यधिक ड्यूटी आवर्स, माइलेज अलाउंस और कार्यस्थल की सुरक्षा, असामान्य तबादलों, HRA जैसे ज्वलंत मुद्दों पर यूनियन नेताओं ने प्रबंधन के समक्ष घुटने टेक दिए हैं अथवा बिचौलिये की भूमिका में हैं. रनिंग स्टाफ में यह संदेश घर कर गया कि यूनियन नेता अधिकारियों के करीब हैं और कर्मचारियों के दूर, तो इसका सीधा खामियाजा आगामी सीक्रेट बैलेट (Secret Ballot) चुनावों में मेंस यूनियन को भुगतना पड़ सकता है.
आगामी रेलवे मान्यता (Secret Ballot) चुनावों की सुगबुगाहट के बीच चक्रधरपुर मंडल की ट्रेड यूनियन राजनीति एक अत्यंत नाजुक और निर्णायक मोड़ पर खड़ी है. शिवगोपाल मिश्रा ने चक्रधरपुर आकर संगठन में नई जान फूंकने और ‘खोया विश्वास’ लौटाने का जो बीज बोया है, वह कितना अंकुरित हो पाएगा, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि मेंस यूनियन अपने स्थानीय नेतृत्व की गुटबाजी, दलाली की छवि और निष्क्रियता पर कितनी जल्दी लगाम लगा पाती है.
यदि local स्तर पर सुधार के कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो 20 साल के लंबे इंतजार के बाद शिवगोपाल मिश्रा द्वारा तैयार किया गया राजनीतिक माहौल भी बंजर जमीन पर की गई बारिश जैसा साबित हो सकता है. ‘ब्रांड शिवगोपाल’ का यह दांव SERMU की डूबती नैया को पार लगा पाता है या नहीं, इसका फैसला आने वाले समय में सीक्रेट बैलेट के बक्से ही करेंगे.
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