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    Home » ECR कार्मिक विभाग की ‘अंधेरगर्दी’, 79 JE प्रशिक्षुओं के हक पर डाका, रेलवे बोर्ड के आदेशों को ठेंगे पर रख रहे अधिकारी!
    रेलहंट स्पेशल

    ECR कार्मिक विभाग की ‘अंधेरगर्दी’, 79 JE प्रशिक्षुओं के हक पर डाका, रेलवे बोर्ड के आदेशों को ठेंगे पर रख रहे अधिकारी!

    Railhunt News DeskBy Railhunt News DeskJuly 20, 2026
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    सांकेतिक तस्वीर
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    • नियमों की ‘मनमानी व्याख्या’ कर यात्रा भत्ता दबाए बैठा है DDU मंडल का प्लांट डिपो प्रशासन; PCPO की ‘अकर्मण्यता’ से रेलकर्मियों में भारी उबाल

    Deendayal Upadhyaya . पूर्व मध्य रेलवे (ECR) का कार्मिक विभाग इन दिनों रेलकर्मियों के कल्याण के लिए कम और उन्हें मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए ज्यादा चर्चा में है. नया मामला दीनदयाल उपाध्याय (DDU) मंडल के प्लांट डिपो का है, जहां नियमित परीक्षा पास करके आए 79 रेल कर्मचारियों के जायज हक पर प्रशासनिक तानाशाही का बुलडोजर चलाया जा रहा है.

    GDCE (सामान्य विभागीय प्रतियोगी परीक्षा) कोटा के तहत चयनित इन 79 JE (TMC) प्रशिक्षुओं के यात्रा भत्ता (TA/DA) विपत्रों के भुगतान में कार्मिक विभाग के बाबू और अधिकारी इस कदर आना-कानी कर रहे हैं, जैसे यह पैसा सरकारी खजाने से नहीं बल्कि उनकी जेब से जा रहा हो.

    वर्तमान में ये सभी 79 प्रशिक्षु प्रयागराज में अपना प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय अधिकारियों की मनमानी और ‘अकर्मण्यता’ के कारण वे आर्थिक तंगी से जूझने को मजबूर हैं.

    जब नियुक्ति पत्र में है जिक्र, तो भुगतान में क्यों है ‘घूस और घपले’ की बू?
    सोचने वाली बात यह है कि इन सभी प्रशिक्षुओं का चयन किसी चोर दरवाजे से नहीं, बल्कि रेलवे की पूरी तरह से वैध और नियमित प्रावधिक परीक्षाओं के आधार पर हुआ है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन अभ्यर्थियों को जारी नियुक्ति पत्र में रेलवे बोर्ड के पत्र संख्या 48/06 का स्पष्ट उल्लेख है.

    इसके बावजूद, प्लांट डिपो (मुगलसराय) के संबंधित अधिकारी तमाम दस्तावेजों, नियमों और साक्ष्यों को कूड़ेदान में डालकर बैठे हैं. पीड़ित कर्मचारियों द्वारा बार-बार नियम दिखाए जाने के बाद भी फाइल को दबाकर रखना कार्मिक विभाग की किसी ‘कुत्सित मंशा’ या ‘लेन-देन’ की नीति की तरफ इशारा करता है.

    इन दो सरकारी नियमों को खा गए DDU के अधिकारी !

    ‘रेलहंट’ इस खबर के माध्यम से उन स्पष्ट नियमों को उजागर कर रहा है, जिन्हें दबाकर स्थानीय अधिकारी अपनी ढीठता का प्रदर्शन कर रहे हैं:

    IREC Volume 02 का Rule 1685: यह नियम साफ तौर पर प्रावधान करता है कि नियमित प्रक्रिया के तहत विभागीय परीक्षा पास करके आए रेल कर्मचारियों की प्रशिक्षण अवधि का TA/DA पूरी तरह से नियम सम्मत, वैध और उनका कानूनी अधिकार है.

    रेलवे बोर्ड का पत्र संख्या 48/06: इस आदेश के तहत प्रारंभिक प्रशिक्षण अवधि (जिसमें ZRTI ट्रेनिंग और IRTMTC ट्रेनिंग दोनों सत्र शामिल हैं) के प्रथम 180 दिनों के लिए यात्रा भत्ता (TA) का भुगतान शत-प्रतिशत देय है.

    जब रेलवे बोर्ड का यह आदेश इन कर्मचारियों के नियुक्ति पत्र का हिस्सा है, तो किसी स्थानीय स्तर के अधिकारी या बाबू को इसकी ‘मनमानी व्याख्या’ करने और वैध दावे को रोकने का अधिकार किसने दिया?

    PCPO की शिथिलता से बढ़ा असंतोष, कब जागेगा प्रशासन?

    इस पूरे मामले में पूर्व मध्य रेलवे के प्रमुख मुख्य कार्मिक अधिकारी (PCPO) की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. जोन के सर्वोच्च कार्मिक अधिकारी होने के नाते क्या उन्हें इस बात की भनक नहीं है कि उनके नाक के नीचे 79 तकनीकी रेलकर्मियों के अधिकारों का हनन हो रहा है? स्थानीय अधिकारियों की इस तानाशाही पर PCPO की चुप्पी व्यवस्था के लिए बेहद शर्मनाक है.

    प्रशिक्षण के दौरान जब कर्मचारियों को पूरी एकाग्रता के साथ काम सीखना चाहिए, तब वे अधिकारियों के चक्कर काटने और अपने ही पैसे के लिए गिड़गिड़ाने पर मजबूर हैं. इस प्रशासनिक लापरवाही से इन युवाओं में भारी असंतोष पनप रहा है, जो आने वाले समय में रेल संचालन की सुरक्षा के लिए भी ठीक नहीं है.

    रेलहंट का कड़ा निष्कर्ष

    रेलवे बोर्ड के स्पष्ट दिशा-निर्देशों को दरकिनार करना सीधे तौर पर प्रशासनिक अनुशासनहीनता है. कार्मिक विभाग को अपनी ‘अकर्मण्य’ छवि सुधारनी होगी और इन 79 प्रशिक्षुओं का वाजिब यात्रा भत्ता अविलंब जारी करना होगा. अगर समय रहते इन युवाओं को इनका हक सुनिश्चित नहीं कराया गया, तो यह मामला रेलहंट की खोजी नजरों से बच नहीं पाएगा. सफर जारी है, और हमारी नजर भी!

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