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करोड़ों खर्च कर संवारे गए अमृत भारत स्टेशन, उपयोगिता के सवालों से घिरी ‘अत्याधुनिक’ व्यवस्था

सांकेतिक

NDLS. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 17 जुलाई को अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत उत्तर रेलवे के 11 अत्याधुनिक रेलवे स्टेशनों का लोकार्पण करने जा रहे हैं. इन स्टेशनों में अंबाला रेल मंडल के अंब अंदौरा, साहिबजादा अजीत सिंह नगर (मोहाली), कालका और आनंदपुर साहिब जैसे महत्वपूर्ण स्टेशन शामिल हैं.

रेलवे विभाग इन स्टेशनों को ‘भविष्य की जरूरतों’ के अनुरूप ढालने और यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं देने का दावा कर रहा है. लेकिन इस भारी-भरकम बजट के जमीन पर उतरने के साथ ही एक बड़ा यक्ष प्रश्न भी खड़ा हो गया है. क्या करोड़ों रुपये के इस आलीशान बुनियादी ढांचे का वास्तविक लाभ आम यात्रियों को मिलेगा, या यह सिर्फ एक चकाचौंध भरा शोपीस बनकर रह जाएगा?

‘अत्याधुनिकता’ की भारी-भरकम कीमत

अगर बजट पर नजर डालें, तो इन 11 स्टेशनों के पुनर्विकास पर पानी की तरह पैसा बहाया गया है. जालंधर कैंट स्टेशन इस सूची में सबसे महंगा है, जिसके आधुनिकीकरण पर अकेले 98.89 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. कालका स्टेशन को 31.42 करोड़ रुपये की लागत से चमकाया गया है. नरवाना स्टेशन पर 28.30 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. अंब अंदौरा, आनंदपुर साहिब और मोहाली जैसे स्टेशनों में से प्रत्येक पर औसतन 22 से 24 करोड़ रुपये की राशि खर्च की गई है.

दावा है कि इन स्टेशनों पर 12 मीटर चौड़े फुट ओवर ब्रिज, एग्जीक्यूटिव लाउंज, आधुनिक प्रतीक्षालय, लिफ्ट, एस्केलेटर, हाई-मास्ट एलईडी लाइटिंग और दिव्यांगजन-अनुकूल सुविधाएं विकसित की गई हैं. तकनीकी रूप से यह ढांचा बेहद आकर्षक दिखाई देता है, लेकिन करोड़ों खर्च करने की यह उपयोगिता अब तीखे सवालों के घेरे में है.

उपयोगिता की कसौटी पर खड़े होते तीखे सवाल

जब आम नागरिक इन आंकड़ों को देखता है, तो उसकी उम्मीदें और जमीनी हकीकत आपस में टकराती हैं. रेलवे के इस मेकओवर को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं:

बुनियादी परिचालन बनाम बाहरी चकाचौंध: आम यात्रियों का सबसे बड़ा दर्द स्टेशनों की भव्यता नहीं, बल्कि ट्रेनों का समय पर न चलना, सामान्य डिब्बों (General Coaches) में पैर रखने की जगह न होना और पटरियों का पुराना होना है. सवाल यह है कि जब सुरक्षा और समयबद्धता जैसे बुनियादी ढांचे में सुधार की सख्त जरूरत है, तब केवल स्टेशनों की दीवारों और लाउंज को चमकाने में करोड़ों फूंकने की उपयोगिता कितनी जायज है?

सस्टेनेबिलिटी और रखरखाव की चुनौती: भारतीय रेलवे का इतिहास गवाह है कि नई सुविधाएं शुरू तो धूमधाम से हो जाती हैं, लेकिन कुछ ही महीनों में रखरखाव के अभाव में लिफ्ट और एस्केलेटर बंद पड़ जाते हैं. एलीट यात्रियों के लिए बनाए गए ‘एग्जीक्यूटिव लाउंज’ क्या आम जनता की पहुंच में होंगे? अगर आम यात्री इनका उपयोग नहीं कर पाएगा, तो इस भारी निवेश का वास्तविक लाभांश (ROI) शून्य के बराबर हो जाता है.

स्थानीय आवश्यकताओं की अनदेखी: मोहाली और आनंदपुर साहिब जैसे स्टेशनों पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों की भारी भीड़ होती है. वहां भव्य फुट ओवर ब्रिज तो बना दिए गए हैं, लेकिन क्या ट्रेनों की संख्या और उनके फेरे बढ़ाए गए हैं? यदि स्टेशन पर उतरने के बाद यात्री को घंटों ट्रेन का इंतजार करना पड़े, तो 24 करोड़ के स्टेशन का सुख केवल एक छलावा मात्र है.

केवल लोकार्पण नहीं, जवाबदेही भी तय हो

17 जुलाई को होने वाला लोकार्पण निसंदेह मीडिया की सुर्खियों में रहेगा और इसे एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जाएगा. लेकिन जनता के टैक्स के पैसों से बने इन ‘अमृत भारत स्टेशनों’ की वास्तविक परीक्षा लोकार्पण के बाद शुरू होगी.

सरकार और रेलवे प्रशासन को यह समझना होगा कि आधुनिकता केवल कांच की खिड़कियों, चमचमाती एलईडी लाइटों और महंगे पत्थरों से नहीं आती. असली ‘अमृत’ तब निकलेगा जब यह करोड़ों का खर्च ट्रेनों की सुरक्षा, गति, स्वच्छता और आम गरीब यात्री के सफर को सुगम बनाने में परिलक्षित होगा. यदि ऐसा नहीं होता है, तो भविष्य में इन परियोजनाओं की उपयोगिता की पोल खुलना तय है, और यह करोड़ों का खर्च महज एक राजनीतिक विज्ञापन बनकर रह जाएगा.

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