- Indian Railways Ticket Checking Staff Organisation (IRTCSO) ने जतायी नाराजगी, कहा – शिकातयों को गंभीरता से नहीं लेता रेल प्रशासन
Lucknow से प्रकाश
लखनऊ जंक्शन स्थित टीटीई रनिंग रूम (रेस्ट हाउस) TTE Running Room (Rest House) में गुरुवार दोपहर बाद लगभग चार बजे हुआ हादसा महज एक ‘इत्तेफाक’ नहीं माना जा सकता. यह रेलवे के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में गहराई तक जड़ जमा चुके प्रशासनिक भ्रष्टाचार और तकनीकी घोर लापरवाही का जीता-जागता सबूत है.
यहां आराम कर रहे टिकट चेकिंग स्टाफ के ऊपर अचानक भरभराकर फॉल्स सीलिंग की छत गिर गई, तो यह संयोग था कि वह कंक्रीट का मलबा नहीं था. रेलकर्मियों का कहना है कि यह घटना रेलवे की कार्यप्रणाली की खोखली हो चुकी व्यवस्था का ढहना माना जा सकता है.
इंजीनियरिंग विभाग की ‘कागजी’ कार्यप्रणाली और घोर लापरवाही
किसी भी विभागीय परिसर की ढांचागत सुरक्षा (Structural Safety) की सीधी जिम्मेदारी सिविल इंजीनियरिंग विभाग की होती है. इस हादसे ने विभाग की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
निरीक्षण का अभाव: नियमतः भवनों का समय-समय पर ऑडिट और मेंटेनेंस होना अनिवार्य है. लेकिन बिना किसी प्राकृतिक आपदा के छत का इस तरह ताश के पत्तों की तरह ढह जाना यह साबित करता है कि ग्राउंड लेवल पर कोई जांच नहीं की जा रही थी.
चेतावनी को ठंडे बस्ते में डालना: कर्मचारी संगठनों (जैसे इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ ऑर्गनाइजेशन) Indian Railways Ticket Checking Staff Organisation (IRTCSO) ने इस जर्जर रेस्ट हाउस की बदहाली को लेकर कई बार लिखित और मौखिक शिकायतें दर्ज कराई गईं. इसके बावजूद कोई कदम न उठाना इंजीनियरिंग विंग की आपराधिक उदासीनता को ही दर्शाता है.
बजट का ‘घालमेल’ और भ्रष्टाचार का विकराल रूप
रेलवे में कर्मचारियों के आवासों और रनिंग रूम के आधुनिकीकरण एवं मरम्मत के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट आवंटित होता है. बावजूद समय पर देखरेख के अभाव में ऐसी घटनाएं हो रही है. IRTCSO के नेताओं का कहना है कि लगभग सभी डिवीजन में रेलवे के कई रेस्ट हाउस ऐसे में जिनकी व्यवस्था पर सवाल उठाये जाते रहे है लेकिन इंजीनियरिंग विभाग मौन साधे रहता है.
रेलवे के टिकट चेकिंग कर्मचारियों का कहना है कि कुछ माह पूर्व गोरखपुर में भी रुम का भी सीलिंग टूट कर गिरा था, इसमें रेलकर्मी को चोट लगी थी.
घटिया निर्माण और फंड का दुरुपयोग: बजट पास होने के बाद भी यदि अग्रिम मोर्चे पर काम करने वाले टिकट चेकिंग स्टॉफ को ऐसी जानलेवा छतों के नीचे सोने पर मजबूर होना पड़ रहा है, तो यह सीधे तौर पर फंड के बंदरबांट और मरम्मत में घटिया सामग्री के इस्तेमाल की ओर इशारा करता है.
शून्य जवाबदेही: पूर्व में भी इसी स्थान पर ऐसी ही घटना होने के बावजूद अधिकारियों के “कान में जूं न रेंगना” यह साफ करता है कि व्यवस्था में जवाबदेही पूरी तरह खत्म हो चुकी है. भ्रष्टाचार केवल पैसों की हेराफेरी नहीं, बल्कि कर्मचारियों के जीवन को दांव पर लगाने वाली यह संवेदनहीनता भी है.
बड़ा सवाल
सोशल मीडिया पर कर्मचारियों का गुस्सा साफ उबल रहा है. सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी या किसी रेलकर्मी की ‘शहादत’ का इंतजार कर रहा था? यदि इस भ्रष्टाचार और लचर इंजीनियरिंग कार्यप्रणाली पर तुरंत कड़ा प्रहार नहीं किया गया, तो अगले हादसे की जिम्मेदारी किस अधिकारी की होगी?
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