LUCKNOW/KOLKATA. भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्र सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) नीति और दावों के बीच भारतीय रेलवे में रिश्वतखोरी का एक बड़ा मामला सामने आया है. एक तरफ जहां सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी खुलेआम घूसखोरी में लिप्त हैं.
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने इस दिशा में बड़ी कार्रवाई करते हुए अनुसंधान डिजाइन और मानक संगठन (RDSO), लखनऊ के डिप्टी डायरेक्टर और सीनियर सेक्शन इंजीनियर को 4 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है.
हावड़ा के होटल में बिछाया गया जाल
सीबीआई की टीम को गुप्त सूचना मिली थी कि आरडीएसओ (RDSO) के अधिकारी एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने के बदले रिश्वत की मांग कर रहे हैं. इस सूचना के आधार पर सीबीआई की कोलकाता और लखनऊ टीम ने संयुक्त रूप से योजना बनाई और हावड़ा के एक होटल में जाल बिछाकर छापेमारी की. इस दौरान आरडीएसओ के डिप्टी डायरेक्टर आशुतोष कुमार और सीनियर सेक्शन इंजीनियर दीपक कुमार को कोलकाता की निजी कंपनी ‘उत्कर्ष इंडिया लिमिटेड’ के दो प्रतिनिधियों—शशांक अग्रवाल और स्वरूप कुमार राय—से 4 लाख रुपये घूस लेते हुए धर दबोचा.
कार्रवाई में 4.73 लाख नकद और दस्तावेज बरामद
सीबीआई ने मौके से रिश्वत की राशि के अलावा 4.73 लाख रुपये की अतिरिक्त नकदी और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए हैं. सीबीआई की टीमों ने आरोपियों से जुड़े कई ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की, जिसमें लखनऊ के अलावा कोलकाता, बिहार के चंपारण और कैमूर स्थित ठिकाने शामिल हैं. इन छापों के दौरान सीबीआई ने कई संदिग्ध दस्तावेज और डिजिटल सबूत भी कब्जे में लिए हैं.
निरीक्षण की अनुकूल रिपोर्ट के बदले मांगी थी घूस
जांच में सामने आया है कि रेलवे अधिकारियों ने निजी कंपनी के साथ साठगांठ कर फैक्ट्री में लगी मशीनरी और प्लांट के निरीक्षण (Inspection) की अनुकूल रिपोर्ट जारी करने का सौदा किया था. इसके बदले में 4 लाख रुपये की रिश्वत मांगी गई थी. शिकायत मिलने पर सीबीआई ने मामले का सत्यापन किया और आरोपियों को रंगे हाथों पकड़ लिया.
रेलवे में सीबीआई की लगातार छापेमारी
यह घटना कोई अकेली नहीं है; हाल के दिनों में रेलवे में भ्रष्टाचार के मामलों पर सीबीआई की लगातार छापेमारी जारी है. लगातार हो रही इन गिरफ्तारियों से यह स्पष्ट है कि रेलवे विभाग में निचले से लेकर उच्च पदों तक रिश्वतखोरी का जाल फैला हुआ है. सीबीआई की इस ताजा कार्रवाई ने रेलवे महकमे में हड़कंप मचा दिया है और सभी आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है.
सफेद हाथी साबित हो रहा रेलवे विजिलेंस
रेलवे में सीबीआई की यह ताबड़तोड़ और लगातार हो रही छापेमारी एक तरफ जहां केंद्रीय एजेंसियों की मुस्तैदी दर्शाती है, वहीं दूसरी ओर रेलवे के अपने ‘सतर्कता विभाग’ (Vigilance Department) की पोल खोलती है. भारी-भरकम वेतन और तमाम सुख-सुविधाएं लेने वाले विजिलेंस अधिकारी अपने ही विभाग के अंदर पनप रहे इस संगठित भ्रष्टाचार को पकड़ने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं. विजिलेंस विभाग की यह निष्क्रियता सवाल खड़े करती है कि जब बाहरी एजेंसी सीबीआई को अंदरूनी घूसखोरी की सटीक सूचनाएं मिल जाती हैं, तो रेलवे का आंतरिक विजिलेंस तंत्र ‘सफेद हाथी’ बनकर क्यों बैठा रहता है?
प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल : रेलवे में निचले स्तर से लेकर उच्च अधिकारियों तक फैली घूसखोरी की यह जड़ें दर्शाती हैं कि विभागीय निगरानी व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है. जब तक विजिलेंस विभाग अपनी जिम्मेदारी मुस्तैदी से नहीं निभाएगा और सख्त जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक केवल बयानों से भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का सपना अधूरा ही रहेगा.
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