Tatanagar/Chakradharpur. टाटानगर रेलवे स्टेशन के समीप प्रदीप मिश्रा चौक पर रेलवे लीज भूमि (JUGSALAI/1) पर अवैध कब्जे का मामला अब रेलवे के अभियंताओं की कार्यशैली और साख पर सवाल खड़ा कर रहा है. रेल प्रशासन की स्पष्ट चेतावनी और लीजधारी का किराया (राजस्व) रोकने के बावजूद मौके से न तो अवैध शराब-पटाखा दुकानें हटी हैं और न ही बिना अनुमति का निर्माण कार्य रोका गया.
स्वीकृत क्षेत्रफल से लगभग 600 वर्ग फुट अधिक जमीन पर कब्जा कर व्यावसायिक उपयोग के अलावा निर्माण कार्य धड़ल्ले से जारी है. चक्रधरपुर मंडल के वरिष्ठ मंडल अभियंता (Sr. DEN) मनीष कुमार द्वारा जांच बैठाए जाने और राजस्व वसूली पर रोक लगाने के बाद भी धरातल पर इसकी कोई प्रभावी कार्रवाई न होना यह बड़ा सवाल खड़ा करता है.
क्या अवैध निर्माण कराने में मिलीभगत के आरोपी स्थानीय आईओडब्ल्यू (IOW) उपेंद्र कुमार और एडीईएन (ADEN) आरके वर्मा का तंत्र सीनियर डीईएन (Sr. DEN) के आदेशों पर भारी पड़ रहा है? रेलवे राजस्व और सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ने से पूरा रेल प्रशासन लाचार नजर आ रहा है.
नियम तोड़कर कैसे चल रही है शराब और पटाखा दुकानें
रेलवे के स्पष्ट नियमों के मुताबिक पट्टे (लीज) की जमीन पर शराब, पटाखों या किसी भी ज्वलनशील सामग्री की दुकानें चलाना सख्त मना है. इसके बावजूद प्रदीप मिश्रा चौक स्थित जुगसलाई लीज/1 की आवंटित जमीन पर सालों से बेखौफ शराब और पटाखा दुकानें फल-फूल रही हैं. इसे न केवल सुरक्षा मानकों की सरेआम अवहेलना बल्कि रेलवे के लीज एग्रीमेंट पर सीधा-सीधा कुठाराघात माना जा रहा है.
रेलवे के सिस्टम पर भारी पड़ रही सांठगांठ!
इतने बड़े पैमाने पर हो रहे अतिक्रमण और वर्षों से जारी अनियमितताओं ने स्थानीय इंजीनियरिंग विभाग की नीयत, कार्यशैली और रेलवे की पूरी निगरानी प्रक्रिया (Monitoring System) को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है:
मुख्यालय से जानकारी छुपाना : सालों से खुलेआम चल रही इस गंभीर अनियमितता और लीज शर्तों के उल्लंघन पर स्थानीय सहायक मंडल अभियंता (ADEN) और निरीक्षक कार्य (IOW) की चुप्पी बेहद संदेहास्पद है. इतने लंबे समय तक मुख्यालय को अंधेरे में क्यों रखा गया? क्या यह नियमित निरीक्षण की विफलता है या फिर आंखें मूंदने के बदले कोई बड़ी सांठगांठ?
स्थानीय अफसरों की शह और मिलीभगत की आशंका : रेल प्रशासन द्वारा चेतावनी दिए जाने और सीनियर डीईएन (Sr. DEN) के आदेश पर किराया वसूली रोकने के बावजूद मौके पर अवैध निर्माण का बेधड़क जारी रहना किसी बड़े संरक्षण का इशारा करता है. जब शीर्ष अधिकारी सख्त कदम उठा चुके हैं, तो धरातल पर स्थानीय अभियंताओं की नाक के नीचे उनका अनुपालन (Compliance) क्यों नहीं हो पा रहा? क्या स्थानीय तंत्र उच्च अधिकारियों के आदेशों को ठेंगा दिखा रहा है?
रेलवे राजस्व को भारी चूना : स्वीकृत 8960 वर्ग फुट से अधिक लगभग 600 जमीन पर अवैध कब्जा और बिना अनुमति व्यावसायिक इस्तेमाल से रेलवे को हर महीने लाखों के राजस्व का नुकसान होता रहा. अधिकारियों की इस संदिग्ध अनदेखी व नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है?
रूटीन इंस्पेक्शन और निगरानी व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
रेलवे नियमों के मुताबिक आईओडब्ल्यू और एडीईएन का काम अपने क्षेत्र की जमीन की सुरक्षा, लीज शर्तों के पालन की जांच और अनधिकृत निर्माण पर तुरंत कार्रवाई करना है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि सालों-साल चलने वाले ‘रूटीन इंस्पेक्शन’ में यह अतिक्रमण अधिकारियों की नजर से कैसे ओझल रहा? अगर नजर थी, तो रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं हुई? उच्च अधिकारियों के रोक के बाद भी कार्रवाई न होना यह प्रमाणित करता है कि मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि गहरी मिलीभगत का है, जिसकी उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच होनी बेहद जरूरी है.
रेलहंट की नजर इस प्रकरण पर बनी रहेगी…क्रमश :
रेलहंट का प्रयास है कि सच रेल प्रशासन के सामने आये. ऐसे में अगर किसी को यह लगता है उसकी बात नहीं सुनी जा रही है तो वह अपना पक्ष whatsapp 9905460502 पर भेज सकते है, उसे पूरा स्थान दिया जायेगा.
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