बृजेश कुमार यादव
बचपन से ही सुनता आया हूं कि ‘सब दिन होत न एक समाना’! यानी आज जिनका दिन अच्छा है, जरूरी नहीं कि कल भी अच्छा होगा. फिर जिनका ‘बुरा’ है, उनका ‘बुरा’ ही रहेगा, यह भी जरूरी नहीं! यानी जीवन-जगत में कुछ भी स्थायी नहीं है. आज जिस चीज का महत्त्व हमारे लिए नहीं है, वह हमेशा महत्त्वहीन रहेगा, यह भी कोई नहीं कह सकता. ये बातें साफ उस समय हुर्इं, जब मैं कुछ दिनों के लिए गांव गया. आज के गांव पंद्रह-बीस वर्ष पहले के गांव से बहुत बदल गए हैं. बदलाव सकारात्मक-नकारात्मक दोनों तरह का है. एक तरफ जहां बाहरी रूप में ग्रामीण जीवन का रहन-सहन, खान-पान, पहनावा बदला हुआ या तेजी से बदलता हुआ देखने में आधुनिक लगता है, वहीं तकनीकी विकास, पूंजी केंद्रित होती अर्थव्यवस्था ने मनुष्य को ‘नफा-नुकसान’ के झमेले में फंसा कर मात्र उपभोक्ता बना कर छोड़ दिया है. अब धीरे-धीरे सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी संवेदनात्मक बदलाव या ह्रास देखने-महसूस करने को आसानी से मिल जाता है. अब स्पष्ट हो गया है कि सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक रूप से होने वाले परिवर्तन से हम बहुत समय तक बच कर नहीं रह सकते. गांव में एक दिन सुबह उठा तो देखा कि पिताजी रोज की तरह पशुओं के सेवा में लगे हैं. जिस काम को वे अभी तक बहुत शिद्दत और चाव से करते आ रहे थे, उसी काम में बहुत दुखी और खिन्न दिखे.
अब धीरे-धीरे सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी संवेदनात्मक बदलाव या ह्रास देखने-महसूस करने को आसानी से मिल जाता है. अब स्पष्ट हो गया है कि सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक रूप से होने वाले परिवर्तन से हम बहुत समय तक बच कर नहीं रह सकते.
वे गाय दुहने के लिए तैयार खड़े थे, लेकिन बछड़े को छोड़ने से पहले गुस्से में कुछ भुनभुना रहे थे और उखड़े-से नजर आ रहे थे. जब मैंने उनसे परेशानी जाननी चाही तो उन्होंने कहा कि परेशानी क्या होगी… ये बछड़ा दूध दुहने के पहले काफी तंग करता है. तब मैंने कहा कि इसमें नया क्या है, ये तो हमेशा से पीने के लिए छटपटाते रहे हैं! इस पर उन्होंने मुझे कहा- ‘तुम नहीं समझोगे! इन्हें अब खिला-पिला कर क्या होगा! अब तो इनका इस्तेमाल हल जोतने में भी नहीं हो सकता. कौन पूछेगा अब इनको..! अगर दोनों गाय बछिया दी होतीं तो कितना बढ़िया होता. एक उम्मीद होती.’यानी उनका असली दर्द सामने आया. मैं हैरान था और सोच में पड़ गया. क्या मेरे पिता वही व्यक्ति हैं, जो कभी अपने बछड़े और बैलों को प्यार करने के लिए क्षेत्र में जाने जाते थे? क्या वे वही हैं जो आज से दस-पंद्रह वर्ष पहले अपने बछरुओं के साथ ही उठना-बैठना, सोना-जागना करते थे और उन्हीं से बतियाना जिनका मुख्य शगल था? जिन्होंने अपने बैलों को दूध की ढरकी पिलाई हो, चने-अरहर की रोटी खिलाई हो, रोज बदन पर खरहरे मार कर चमकाते रहे हों, आज वे उसी से इतना क्षुब्ध क्यों हो गए! क्या वे वही हल जोतने वाले किसान हैं जो एक जमाने में हल हांकते हुए अपने थके-मांदे मंथर गति से चलने वाले बैलों को मारने के बजाय उन्हें प्यार करने वाले गीत गाकर और मुंह से एक खास आवाज निकाल कर अपने सुस्त बैलों में ऊर्जा का संचार करते थे? एक समय था, जब वे ट्रैक्टर से खेती होने के बावजूद दरवाजे पर शौकिया बछड़े-बैल को रखते थे. हालांकि पिताजी की इन बातों में मुझे कहीं न कहीं संवेदना का वह भाव भी दिख रहा था, जो गुस्से की ओट में छिपा था और जो एक किसान की अपने प्रिय पशुओं के प्रति होती है. लेकिन वह संवेदना अब मर रही थी और उसकी जगह नफा-नुकसान का पूंजीवादी बाजारू भाव हावी-प्रभावी दिख रहा था! अब मैं उनकी झल्लाहट के कारण को समझ चुका था.
एक जमाना था जब किसान के लिए गाय दोनों हाथ में लड्डू की तरह होती थी. गाय ने बछिया को जन्म दिया तो भी खुशी और बछड़े को जन्म दिया तो दुगनी खुशी! बछड़ों को भारतीय किसानों के बीच बेहद अहमियत हासिल रही है. लेकिन आज उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है. सरकार ने भी हाल में गोरक्षा के नाम पर जो नियम-कानून बनाए हैं और गोरक्षकों ने गाय-बैल के व्यापारियों पर जो कहर बरपाया है, उससे न सिर्फ इनकी पूछ कम हो गई है, बल्कि किसान और व्यापारियों की आर्थिक हालत भी दिनोंदिन बिगड़ती चली जा रही है. पिछड़े क्षेत्रों और छोटे शहरों में यही मुख्य वजह है कि छुट्टा घुमंतू सांड़ों की संख्या में बहुत वृद्धि हुई है. एक समय दरवाजे पर बैलों की जोड़ी का नांद पर बंधा होना शान समझा जाता था. उससे न केवल किसान का पशुओं के प्रति प्यार, बल्कि उसकी जमीन-जायदाद से जुड़ी हैसियत भी मापी जाती थी. लेकिन आज किसान गाय बिसूखते यानी उसके दूध देना बंद करते ही उन बछड़ों को दूर छोड़ आता है जो उसके लिए कभी गर्व करने का मामला होते थे.
जनसत्ता से साभार
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