- मीडिया स्टिंग में खुला अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस में लीज पार्सल में बड़े फर्जीवाड़ा का राज
- रेलकर्मियों से मिलीभगत कर रेलवे को हर माह करोड़ों का चूना लगा रहा पार्सल लीज सिंडिकेट
- रेलवे विजिलेंस की नाकामी या मिलीभगत, यात्रियों की सुरक्षा से हो रहा सीखा खिलवाड़
TATANAGAR. राजधानी से लेकर मेल और सुपरफास्ट ट्रेनों के लीज पार्सल में क्षमता से कई गुना ज्यादा माल लादकर रेलवे को करोड़ों का चूना लगाने का खेल नया नहीं है. टाटानगर में सक्रिय सिंडिकेट पार्सलकर्मियों की मिलीभगत से सालों से बेखौफ इस अवैध धंधे को अंजाम दे रहा. इस सोची-समझी साजिश का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अहमदाबाद, पुणे, नई दिल्ली समेत अन्य स्टेशनों से हावड़ा या पुरी तक बुक ओवरलोड माल सीधे हावड़ा या पुरी नहीं जाता. इसे टाटानगर स्टेशन पर उतार लिया जाता है और यहां से ‘मैनेज’ करके दूसरी ट्रेनों के जरिए हावड़ा अथवा पुरी तक भेज दिया जाता है.
मीडिया स्टिंग में अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस में कागजों पर महज 170 किलो माल दिखाकर बोगी से 2 टन (2,035 किलो) माल उतारने का पकड़ा गया मामला नया नहीं है बल्कि रेलवे पार्सल कर्मियों की मिलीभगत से संचालित यह खेल का सिर्फ एक उदाहरण मात्र है जो सालों से रेलवे अधिकारियों से लेकर स्थानीय पार्सल सुपरवाईजर की जानकारी में खेला जा रहा. इस तरह से हर दिन रेलवे को करोड़ों का नुकसान रेलकर्मियों की मिलीभगत से किया जा चुका है. दिलचस्प है कि रेलवे विजिलेंस और सेफ्टी से जुड़े लोग इस मामले में मौन है जबकि टाटानगर में ही ओवरलोड पार्सल वैन के बीच से टूटने से बड़ा हादसा टलने वाली वारदात हो चुकी है.
हावड़ा की बुकिंग, टाटानगर में अनलोडिंग, रेलवे पार्सल सिंडिकेट के इस खेल के पीछे कौन ?
बीते दिनों मीडिया स्टिंग में अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस के लीज पार्सल से हावड़ा का माल टाटानगर में उतारने का खुलासा हुआ. पार्सल सुपरवाईजर अमित चौधरी ने माना कि मैनिफेस्टो में 17 पैकेट में 170 किलोग्राम टाटानगर में अनलोडिंग करना था. जबकि लीजधारी के लोगों ने टाटानगर में 33 पैकेज उतार लिया ? उतारा गया माल हावड़ा के लिए लोड था जिसका वजन लगभग 1,865 किलोग्राम यानी लगभग दो टन था. सवाल यह उठता है कि 02 टन हावड़ा का माल टाटानगर में क्यों अनलोड किया गया ?
सूत्रों की माने तो हर दिन की तरह ओवरलोड दो टन माल को टाटानगर में उतारकर दूसरे ट्रेन से हावड़ा भेजने की योजना थी लेकिन मीडिया ने खेल बिगाड़ दिया. पूरे प्रकरण में अहम सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिना पार्सल सुपरवाईजर और पार्सल कर्मियों की जानकारीें में यह हो रहा था? क्या इसकी जानकारी सीआई, स्टेशन डायरेक्टर अथवा एसीएम को नहीं थी?
इस महाघोटाले के सामने आने के बाद सीनियर डीसीएम आदित्य चौधरी ने जांच एसीएम एके सिंह को सौंपी है. चूंकि एके सिंह पहले टाटानगर में सीआई (कमर्शियल इंस्पेक्टर) रह चुके हैं, इसलिए उन पर इस पूरे सिंडिकेट का पर्दाफाश करने की बड़ी जिम्मेदारी है. अब देखना यह है कि जांच में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ होता है या फिर हर बार की तरह इस बार भी छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर बड़े चेहरों को बचा लिया जाता है.
सूत्रों की मानें तो यह पूरा खेल टाटानगर में बैठे कुछ रसूखदार अधिकारियों, पार्सल कार्यालय के सुपरवाइजरों की नाक के नीचे चल रहा था. चर्चा तो यहां तक है कि टाटानगर के चीफ पार्सल सुपरवाइजर अमित चौधरी की जानकारी में यह सब पहले से था. सवाल उठना लाजमी है कि जब मैनिफेस्टो में सिर्फ 17 पैकेट उतारने का रिकॉर्ड था, तो लीजधारी के एजेंट बेखौफ होकर 33 भारी-भरकम पैकेज कैसे उतार रहे थे? क्या बिना पार्सल कर्मियों की हिस्सेदारी के इतना बड़ा रिस्क लेना मुमकिन है?
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रेलवे के लीज पार्सल नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित …
मीडिया के स्ट्रिग में जो बातें सामने आयी है वह कोई नयी नहीं है. प्रतिदिन का यह खेल है जो एजेंटों की लड़ाई में सामने आ गया. यह अवैध धंधा सिर्फ रेलवे के राजस्व को ही चपत नहीं लगा रहा, बल्कि यात्रियों की जान के साथ भी बड़ा खिलवाड़ है. मेल और सुपरफास्ट ट्रेनों में क्षमता से ज्यादा वजन लादने से हादसों का खतरा भी बना रहता है. यह सेफ्टी से बड़ा खिलवाड़ है.
फिलहाल, इस पूरे सिंडिकेट का खेल इस बार व्यापारियों की आपसी गुटबाजी और मीडिया की सक्रियता के कारण बिगड़ गया. अहमदाबाद से लेकर हावड़ा तक फैले इस नेटवर्क के तार कहां-कहां जुड़े हैं, यह तो विस्तृत जांच के बाद ही साफ हो पाएगा, लेकिन टाटानगर को इस पूरे घोटाले का टर्मिनेटिंग स्टेशन बनाये जाने से यह तो साफ हो गया है कि रेलवे के लीज पार्सल नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं…
इस पूरे प्रकरण पर रेलहंट की नजर बनी रहेगी…
रेलहंट का प्रयास है कि सच रेल प्रशासन के सामने आये. ऐसे में किसी को अपना पक्ष रखना है तो whatsapp 9905460502 पर भेज सकते है, पूरे सम्मान के साथ उसका संज्ञान लिया जायेगा.
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