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RDSO एप्रुव कंपनियों का नहीं चला एकाधिकार, गैर-आरडीएसओ अनुमोदित फर्मों की इंट्री से बढ़ी प्रतिस्पर्धा

PATNA. पूर्व मध्य रेलवे के दानापुर मंडल विद्युत विभाग के टेंडर में अनियमितता की जांच शुरू होने के बाद कई नये तथ्य सामने आये हैं. रेलवे बोर्ड स्तर पर दिये जांच में यह तथ्य सामने आया है कि खुली निविदा में टेक्निकल एंड फाइनेंसियल एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के अलावा कई mandatory conditions लागू थे जिनकी अवहेलना की गयी. ऐसा बताया जा रहा कि mandatory conditions का पालन नहीं करने के कारण ही आरडीएसओ अनुमोदित कुछ फर्मों की दावेदारी को अमान्य किया गया था. इसके बाद रेलवे बोर्ड की गाइड लाइन के अनुसार ही गैर-आरडीएसओ अनुमोदित फर्मों की इसमें इंट्री मिल सकी. हालांकि मामले की जांच फिलहाल चल रही है.

निविदा संख्या EL-50-DNR-OPEN-45-/2024-25 के बारे में निविदा में शामिल एक फर्म ने बताया कि निविदा IREPS (रेलवे के आधिकारिक खरीद पोर्टल) पर खुली निविदा प्रणाली के माध्यम से संसाधित की गई थी. निविदा दस्तावेजों में सभी निविदा शर्तें स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट थीं. इसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि बोली क्षमता और अन्य तकनीकी आवश्यकताएं अनिवार्य थीं.

PCME/ECR द्वारा निर्दिष्ट ” Similar Nature of Work” की परिभाषा, बोली के दौरान निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए गैर-आरडीएसओ अनुमोदित फर्मों की भागीदारी की स्पष्ट रूप से अनुमति देती है. यही प्रक्रिया दूसरे रेलवे जोनों में अपनाई जा रही है, इसके अतिरिक्त, रेलवे बोर्ड ने अपने दिशानिर्देशों के माध्यम से, पत्र संख्या 2006/इलेक्ट/जी/1142/भाग-I दिनांक 17/01/2019 के माध्यम से स्पष्ट किया है कि OEM के अलावा अन्य फर्मों द्वारा ली जाने वाली सेवा लागत, OEM दरों की तुलना में काफी कम है.

नये तथ्यों में यह बात भी सामने आयी कि आरडीएसओ स्वीकृत फर्म एक साथ मिलकर टेंडर में शामिल होती थी. इस तरह रेट मैनेजमेंट के साथ ये फर्म बड़ा मुनाफ़ा कमाती थी. जबकि कार्य की गुणवत्ता को लेकर भी कई स्तर पर सवाल उठाये जाते रहे. रेलवे बोर्ड और जोनल रेलवे की ओर से इसे ध्यान में रखकर दूसरी योग्य फर्म को भी आरएमपीयू के एएमसी के लिए आमंत्रित किया. इसका नतीजा यह सामने आया कि अनुमानित निविदा मूल्य से 16 प्रतिशत कम पर टेंडर फाइनल हुआ और रेलवे को इससे बचत भी हुई.

इस तरह नयी व्यवस्था में RDSO एप्रुव कंपनियों के एकाधिकार की  चुनौती मिली है और गैर-आरडीएसओ अनुमोदित फर्मों की इंट्री से प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है. ऐसा माना जा रहा है कि इससे कार्य की गुणवत्ता बनाये रखने में मदद मिलेगी जबकि रेलवे का खर्च भी कम होगा. हालांकि इन सबमें बड़ा सवाल यह है कि अधिकारिक स्तर पर कार्य की मॉनिटरिंग को सख्त बनाया जायेगा और टेंडर में होने वाली वित्तीय अनियमितता को रोकने के लिए सख्त कदम उठाये जाये.

नयी व्यवस्था को लेकर कुछ जानकारों ने बताया कि अब तक की स्ट्रैटेजी में RDSO अप्रुव फर्म की ओर से एक इकोसिस्टम बनाया गया था जिसमें अप्रूव्ड वेंडर्स ही मिलकर काम कर रहे थे. इसमें यह तय किया गया था कि कोई नया सप्लायर इस फील्ड में न आए, जिससे मार्केट सिर्फ़ कुछ जमे-जमाए प्लेयर्स के लिए खुला रह जाए जो कार्टेल की तरह यह काम चलता रहे लेकिन नयी व्यवस्था में गैर-आरडीएसओ अनुमोदित फर्मों की इंट्री से प्रतिस्पर्धा बढ़ी है जो RDSO एप्रुव कंपनियों के एकाधिकार के टूटने की बेचैनी के रूप में दिखायी पड़ रही.

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