PRAYAGRAJ. भारतीय रेल विद्युत इंजीनियरी सेवा के 1988 बैच के अधिकारी नरेश पाल सिंह ने सोमवार को उत्तर मध्य रेलवे के महाप्रबंधक का पदभार ग्रहण किया. निवर्तमान महाप्रबंधक उपेंद्र चंद्र जोशी के सेवानिवृत्त होने से यह पद रिक्त था. नरेश पाल सिंह को बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका) के महाप्रबंधक का अतिरिक्त प्रभार साैंपा गया है.
आईआईटी, रुड़की से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग से स्नातक नरेश पाल ने कई प्रमुख पदों पर सेवा दी. मध्य रेलवे के मंडलों में विभिन्न क्षमताओं जैसे लोको शेड, लोको ऑपरेशन, ट्रैक्शन डिस्ट्रीब्यूशन, सामान्य सेवाएं आदि में कार्य किया है. मध्य रेलवे में मुख्य विद्युत इंजीनियर रोलिंग स्टॉक, अपर मंडल रेल प्रबंधक संचालन, मुम्बई मंडल के रूप में भी उल्लेखनीय सेवा प्रदान की है. साथ ही, मुम्बई रेल विकास निगम में मुख्य विद्युत इंजीनियर परियोजना के रूप में भी कार्य किया. बनारस रेल इंजन कारखाना में कार्य भार ग्रहण करने से पूर्व, वे 01 सितम्बर 2022 से मध्य रेलवे, मुम्बई में प्रधान मुख्य विद्युत इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे.
नवम्बर 2024 से महाप्रबंधक बरेका का कार्यभार ग्रहण के उपरांत बनारस रेल इंजन कारखाना ने लोकोमोटिव उत्पादन के क्षेत्र में अनेक मील के पत्थर स्थापित किये हैं. इनके नेतृत्व में वहीं रेल ट्रैक पर सोलर पैनल लगाकर हरित ऊर्जा की दिशा में एक अनूठा कदम उठाया गया. सामाजिक उत्तरदायित्व और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी श्री सिंह के नेतृत्व में बरेका ने उल्लेखनीय कार्य किए. वित्तीय वर्ष 2024-25 में बरेका ने 477 लोको निर्माण कर नया कीर्तिमान स्थापित किया.
इसके पूर्व नरेश पाल सिंह के नेतृत्व में मध्य रेलवे में इलेक्ट्रिकल, डीजल रोलिंग स्टॉक, ट्रैक्शन डिस्ट्रीब्यूशन एवं सामान्य सेवा परिसंपत्तियों के रखरखाव तथा संचालन से संबंधित कई अभिनव परियोजनाओं को शुरू किया गया था. एक प्रमुख परियोजना 2Û25 केवी ट्रैक्शन सिस्टम में पहली बार ओवरहेड इक्विपमेंट मास्ट पर ऑप्टिकल फाइबर ग्राउंड वायर लगाकर एरियल अर्थ कंडक्टर को प्रतिस्थापित किया गया. इस परियोजना से भारतीय रेल को कई लाभ प्राप्त होंगे. यह कवच एवं सिग्नल एवं टेलीकम्युनिकेशन आवश्यकताओं के लिए अत्यधिक विश्वसनीय संचार पथ प्रदान करेगा. इसके अतिरिक्त ऑप्टिक फाइबर कोर के माध्यम से गैर-किराया राजस्व में भी वृद्धि होगी. रेल नेटवर्क में संचार व्यवस्था और भी मज़बूत व सुरक्षित होगी. ग्राउंड मेकिंग टेक्नोलॉजी से भारतीय रेल को करोड़ों रुपये की प्रतिवर्ष बचत होगी.















































































