प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन यह अकेले पूरे मामले को झूठा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है. अदालत ने टिप्पणी की कि विभागीय कार्रवाई और आपराधिक जांच अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं. अग्रिम जमानत के चरण में साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन या मिनी-ट्रायल करना न तो उचित है और न ही स्वीकार्य.
BHOPAL. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने जबलपुर पीठ में सुनवाई के दौरान रेलवे की एक मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक (Chief Booking Supervisor) भावना राय की अग्रिम जमानत अर्जी को खारिज कर दिया है. आरोपी कर्मचारी पर टिकट बिक्री की राशि से ₹4.47 लाख के गबन में शामिल होने का आरोप है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपी का स्वीकृत अवकाश पर होना या विभागीय जांच में राहत मिल जाना, आपराधिक साजिश में उसकी भूमिका की संभावना को पूरी तरह से समाप्त नहीं करता है.
यह मामला इटारसी रेलवे स्टेशन के टिकट बुकिंग कार्यालय से जुड़ा है, जहां 5 और 6 दिसंबर 2024 के बीच बेचे गए टिकटों की ₹4,47,706 की नकदी गायब हो गई थी. इस घटना के संबंध में जीआरपी थाना इटारसी (नर्मदापुरम) में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 316(5) और 61(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था. शिकायत में तीन रेल कर्मचारियों सहायक मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक रिंकी पटेल, मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक भावना राय और स्टेशन प्रबंधक अनिल कुमार राय को नामजद करते हुए आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक पूर्व-नियोजित योजना के तहत इस राशि का गबन किया.
याचिकाकर्ता भावना राय की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि वह एक स्थाई रेल कर्मचारी हैं और उनका सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक रहा है. अधिवक्ता ने कहा कि घटना के दिन वह स्वीकृत अवकाश पर थीं और बुकिंग काउंटर का प्रभार उनके पास नहीं था. इसके अलावा, रेलवे की अपनी विभागीय जांच में भी उस कर्मचारी को जिम्मेदार ठहराया गया था जो उस दिन काउंटर संभाल रहा था. बचाव पक्ष ने यह भी मुद्दा उठाया कि घटना के एक साल से अधिक समय बाद 15 जनवरी 2026 को प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी पर संदेह पैदा होता है.
दूसरी ओर, राज्य सरकार के अधिवक्ता ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मामला रेल कर्मचारियों के बीच एक पूर्व-नियोजित साजिश का है. उन्होंने तर्क दिया कि केवल अवकाश पर होने से आपराधिक साजिश में संलिप्तता खत्म नहीं हो जाती. इसके अतिरिक्त, विभागीय जांच के निष्कर्ष आपराधिक दायित्व को अंतिम रूप से तय नहीं कर सकते और मामले में हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता.
न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि अग्रिम जमानत के चरण में साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन या मिनी-ट्रायल करना न तो उचित है और न ही स्वीकार्य. अदालत ने टिप्पणी की कि विभागीय कार्रवाई और आपराधिक जांच अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं.
अदालत ने आरोपों की गंभीरता, गबन की गई राशि और आपराधिक साजिश के पहलू को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत अर्जी को खारिज कर दिया. उच्च न्यायालय ने यह साफ कर दिया कि प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन यह अकेले पूरे मामले को झूठा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है. इस प्रकार, जांच की जरूरतों और आरोपी की अभी तक अनिर्धारित भूमिका को देखते हुए अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया.
- Itarsi : रेलवे बुकिंग काउंटर से 4.47 लाख के गबन में CBS को नहीं मिली राहत, अग्रिम जमानत याचिका खारिज - August 26, 2026
- ओबीसी रेलवे कर्मचारी संघ ने टाटानगर में मनाई बीपी मंडल की जयंती, मंडल आयोग की सिफारिशों को पूर्ण रूप से लागू करने की मांग - August 25, 2026
- मुंबई में CBI का एक्शन, सैलून दुकानदार से 16 हजार की रिश्वत लेते रेलवे का SSE/Land रंगे हाथों गिरफ्तार - August 25, 2026


















































































