
वीरेंद्र कुमार पालीवाल, बैतूल
भारत का लोकतंत्र विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था मानी जाती है, जिसकी नींव “जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन” के आदर्श पर टिकी है. किंतु स्वतंत्रता के सात दशक बाद, इसकी व्यावहारिक अभिव्यक्ति पर गहन मंथन का क्षण आ गया है. आज सबसे मूलभूत प्रश्न यह उभर रहा है: यदि शासन वास्तव में जनता का है, तो फिर ‘शासक’ और ‘नौकर’ की पारंपरिक अवधारणाएँ किस आधार पर खड़ी हैं ? क्या लोकतंत्र की संरचना के बारे में हमारी समझ अपर्याप्त या अधूरी तो नहीं रह गई है ? यह आज चिंतन का अहम विषय होना चाहिये .
मूलभूत प्रश्न यह है कि मालिक’ कौन है ? और ‘नौकर’ कौन है ? यथाशीघ्र इसका भ्रम दूर किए जाने की आवश्यकता है
लोकतंत्र में कार्यपालिका का प्राथमिक दायित्व है कि वह विधायिका द्वारा निर्मित जनहितकारी कानूनों एवं नीतियों को निष्पक्ष, समयबद्ध और भ्रष्टाचार-मुक्त ढंग से लागू करने में प्रभावी रूप से काम करे . इसका उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना है जहाँ प्रत्येक नागरिक स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और गौरवान्वित अनुभव करे. परंतु वास्तविकता अक्सर इस आदर्श से भिन्न दिखाई देती है. क्या कार्यपालिका, जिसे ‘सेवक’ की भूमिका निभानी चाहिए, व्यवहार में ‘स्वामी’ बन बैठी है ? और क्या जनता, जो वास्तविक ‘मालिक’ है, भ्रमित होकर अपनी इस हैसियत को भूल गई है ? बस यह विसंगति ही हमारे लोकतांत्रिक ढाँचे की सबसे गहरी चुनौती बनकर उभरी है.
‘स्तंभ’ की अवधारणा: एक अपूर्ण रूपक
विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया – इन चारों को लोकतंत्र का स्तंभ कहा जाता रहा है. ‘स्तंभ’ शब्द स्थिरता, दृढ़ता और अपरिवर्तनीय आधार का बोध कराता है. किंतु क्या यह रूपक आज के गतिशील लोकतंत्र के लिए पर्याप्त है ? नहीं कदापि नहीं , आज के दौर में यह अवधारणा किसी भी दृष्टि से सत्य प्रतीत नहीं होती .
विधायिका एवं कार्यपालिका मूलतः गतिशील संस्थाएँ हैं. इनका कर्तव्य जनता के द्वार तक पहुँचना, उनकी आवश्यकताओं को समझना और सेवाओं को उनके घर तक पहुँचाना है. ये लोकतंत्र रूपी रथ के ‘पहिए’ हैं, जो निरंतर गति में रहकर ही उसे गंतव्य तक ले जा सकते हैं.
न्यायपालिका, जो नागरिक का अंतिम आश्रय-स्थल है, भी पूर्णतः स्वायत्त एवं स्थिर नहीं है. उसे अपने निर्णयों के क्रियान्वयन के लिए अंततः कार्यपालिका तंत्र पर ही निर्भर रहना पड़ता है. कई बार माननीय उच्चतम न्यायालय इस विषय पर गंभीरता पूर्वक अपनी बेबसी भी अभिव्यक्त कर चुका है . हकीकत में जनता ही वह वास्तविक एवं दृढ़ ‘स्तंभ’ है, जो इस पूरी व्यवस्था का आधार और अंतिम लक्ष्य दोनों है, और इस सार्वभौमिक सत्य को हम सभी को खुले तौर स्वीकार करना चाहिए. इस प्रकार, लोकतंत्र की छवि कुछ स्थिर स्तंभों और कुछ गतिशील पहियों की मिली-जुली संरचना की बनती है, जहाँ भूमिकाओं का स्पष्ट विभाजन धुंधला पड़ गया प्रतीत हो रहा है.
मीडिया: लोकतंत्र का गतिशील सेतु
इस संपूर्ण ढाँचे में मीडिया की भूमिका हमेशा से बिलकुल ही अद्वितीय, महत्वपूर्ण , निर्णायक और सराहनीय रही है. शक्ति या संसाधनों से संपन्न न होते हुए भी, यह लोकतंत्र का सबसे तेजगामी पहिया है जो अपनी ख़ाली पड़ी थाली की जगह नागरिकों के भूखे पेट की चिंता करता है . यह कैरम-बोर्ड के स्ट्राइकर के समान ही , सूचना एवं विचारों को समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक उनकी मंज़िल तक पहुँचाता है. यह सत्ता की नीतियों को जनता तक और जनता की आकांक्षाओं एवं पीड़ाओं को सत्ता तक ले जाता है, अक्सर औपचारिक संवाद प्रक्रिया से भी पहले.
इसीलिए मीडिया पर निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और राष्ट्रहित के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का दायित्व सर्वाधिक रूप से अलिखित परंतु स्वत: स्थापित हो गया है. आज आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया अपनी इस पवित्र जिम्मेदारी को पूरे आत्मविश्वास के साथ नए सिरे से स्थापित करे और लोकतंत्र के जीवंत सेतु के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करे इस बात को स्वीकार करते हुए कि जनता का संपूर्ण व्यवस्थाओं पर विश्वास बनाए रखने में लोकतंत्र का तीव्र रूप से गतिशील एक मात्र मजबूत पहिया हमारा प्यारा विश्वसनीय मीडिया ही सक्षम है .
पुनर्परिभाषा की ओर :- एक नए लोकतांत्रिक मॉडल का आह्वान
वर्तमान समय की चुनौतियाँ , भ्रष्टाचार, पारदर्शिता का अभाव, जवाबदेही की कमी और संस्थागत असंतुलन हमें स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि लोकतंत्र की परंपरागत अवधारणा को पुनर्परिभाषित करने का समय आ गया है. मूल मंत्र यह होना चाहिए कि जब तक कार्यपालिका तंत्र को पारदर्शी, निष्पक्ष और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन के लिए प्रत्यक्ष रूप से जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक लोकतंत्र का आदर्श साकार नहीं हो सकेगा. आवश्यकता इस नए संतुलन की है, जहाँ प्रत्येक संस्था की भूमिका स्पष्ट हो, उसकी जवाबदेही तय हो, और जनता की गरिमा व अधिकार सर्वोपरि हों. लोकतंत्र को मजबूत करने का मार्ग इसके मूल ढाँचे में आवश्यक सुधार एवं संतुलन से ही गुजरेगा.
अंततः लोकतंत्र को केवल चार स्तंभों पर एक जगह टिकी व्यवस्था की जगह स्थिरता और गति के सामंजस्य के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है . निष्कर्षत: लोकतंत्र को केवल चार स्थिर स्तंभों वाली इमारत के रूप में देखना अपर्याप्त है. यह एकतो एक चार प्रहरियों वाली जीवंत प्रणाली है, जहाँ जनता आधार-स्तंभ है, न्यायपालिका का ‘विधि एवं न्याय’ मार्गदर्शक सिद्धांत हैं, कार्यपालिका क्रियान्वयन की शक्ति है, और मीडिया गतिशील संवाद का माध्यम. नए युग की माँग है कि इन सभी तत्वों के बीच स्थिरता एवं गतिशीलता, अधिकार एवं दायित्व का एक नया, स्पष्ट और संतुलित समीकरण स्थापित किया जाए , तभी हमारा लोकतंत्र वास्तव में ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन’ बन सकेगा और अपने सर्वोच्च आदर्शों को साकार कर पाएगा.
(यह लेखक के निजी विचार है, इससे रेलहंट का कोई सरोकार नहीं है.)















































































