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सर्वोच्च न्यायालय ने कहा – बच्चे के विकास में पिता की भूमिका अहम, पितृत्व अवकाश के लिए बने कानून

  • केंद्र सरकार से कहा “पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने वाला कानून लाइए”

NEW DELHI. देश के सर्वोच्च न्यायालय ने 17 मार्च 2026 को एक ऐतिहासिक टिप्पणी में केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने वाला विधान बनाने का स्पष्ट आग्रह किया है. न्यायमूर्ति मा. जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मा. आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) को चुनौती दी गई थी. यह धारा तीन माह से अधिक आयु के बच्चे को गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व अवकाश के दायरे से बाहर रखती थी.

वीरेन्द्र कुमार पालीवाल

न्यायालय ने इस प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित करते हुए निर्णय दिया कि दत्तक माता को बच्चे की आयु की परवाह किए बिना 12 सप्ताह के मातृत्व अवकाश का पूर्ण अधिकार है. परंतु इस निर्णय से भी बड़ी बात यह रही कि पीठ ने भारतीय श्रम कानून में मौजूद उस कानूनी शून्य की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट किया जो पिता की देखभाल भूमिका को सर्वथा अनदेखा करता आया है. न्यायालय ने सीधे शब्दों में कहा कि बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी केवल माँ की नहीं है — यह दोनों माता-पिता का साझा, समान और अपरिहार्य दायित्व है.

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि पितृत्व अवकाश की अवधि और संरचना ऐसी होनी चाहिए जो माता, पिता और शिशु तीनों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील हो. यह टिप्पणी केवल प्रशासनिक सुझाव नहीं है — यह उच्चतम न्यायपीठ का वह सशक्त संकेत है जिसमें भारतीय परिवार विधि को 21वीं सदी की सामाजिक सच्चाइयों के अनुरूप ढालने की माँग अंतर्निहित है.

कानूनी शून्य जो पिता को ‘अदृश्य देखभालकर्ता’ बनाता है

भारत में ‘मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961’ के अंतर्गत महिलाओं को 26 सप्ताह तक का सवेतन मातृत्व अवकाश उपलब्ध है, किंतु पितृत्व अवकाश के लिए कोई केंद्रीय वैधानिक प्रावधान आज भी नहीं है. केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 15 दिन का सीमित अवकाश मिलता है, जबकि निजी क्षेत्र में यह पूर्णतः नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर है. यह विषमता न केवल कार्यस्थल पर लैंगिक असमानता को पुष्ट करती है, बल्कि समाज में उस रूढ़िवादी मान्यता को भी बल देती है जो पिता को केवल ‘परिवार का आर्थिक आधार-स्तंभ’ और माँ को ‘एकमात्र देखभालकर्ता’ के खाँचे में बंद कर देती है.

न्यायालय का यह भी स्पष्ट मत है कि अभिभावकत्व कोई ‘एकल-भूमिका कर्तव्य’ नहीं, बल्कि एक सहभागी उत्तरदायित्व है. जब पिता को पितृत्व अवकाश नहीं मिलता, तो वह बच्चे के नवजात जीवन के उन अमूल्य प्रथम सप्ताहों में अनुपस्थित रहने को विवश हो जाता है — न इसलिए कि वह नहीं चाहता, बल्कि इसलिए कि कानून उसे यह अवसर ही नहीं देता. यह वंचना बच्चे, माँ और पिता — तीनों के लिए हानिकारक है.

साझा पालन-पोषण: समानता और बाल-कल्याण का संगम

बाल मनोविज्ञान के शोध एकस्वर से यह स्थापित करते हैं कि शिशु के विकास के प्रारंभिक माह उसके मस्तिष्क और भावनात्मक ढाँचे की नींव होते हैं. इस अवधि में पिता की सक्रिय, सुनिश्चित और कानून-समर्थित उपस्थिति न केवल बच्चे की मनोसामाजिक परिपक्वता को गति देती है, बल्कि माँ के उपर पड़ने वाले एकाकी देखभाल-बोझ को भी संतुलित करती है. जब माँ यह जाने कि पिता भी कानूनी अधिकार के साथ घर पर है, तो वह अपने कार्यस्थलीय करियर को बेहतर ढंग से सँभाल सकती है — और यही सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण है.

यह प्रश्न लैंगिक समानता से भी गहरा है. आज का भारत एकल-पालक परिवारों, दत्तक परिवारों और बदलती पारिवारिक संरचनाओं की विविधता को जी रहा है. ऐसे में एक ऐसा कानून जो केवल माँ को देखभालकर्ता मानकर सारी छूट उसे दे, और पिता को उस परिदृश्य से ही हटा दे , वह कानून न तो आज के परिवार को समझता है, न बच्चे के हित में है. सर्वोच्च न्यायालय ने यही सत्य उजागर किया है.

उचित होगा कि संसद अब देर न करे

सरकार के सामने चुनौतियाँ निश्चित रूप से हैं — निजी क्षेत्र पर आर्थिक प्रभाव, अवकाश की उचित अवधि, सवेतन या अर्धसवेतन संरचना, और असंगठित क्षेत्र में इसकी व्यापक पहुँच. परंतु ये प्रश्न नीति-निर्माण के विषय हैं, न कि इस सुधार को टालने के कारण. स्वीडन, जर्मनी, जापान और कनाडा जैसे देश यह कर चुके हैं. भारत में भी यह संभव है — आवश्यकता है तो केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैधानिक संकल्प की.

यह सवाल केवल छुट्टी का नहीं

पितृत्व अवकाश का प्रश्न केवल एक छुट्टी का प्रश्न नहीं है. यह उस समाज के निर्माण का प्रश्न है जिसमें बच्चे को माँ और पिता , दोनों का समान प्यार और उपस्थिति नैसर्गिक अधिकार के रूप में मिले. सर्वोच्च न्यायालय ने जो बीज बोया है, अब संसद की जिम्मेदारी है कि वह उसे कानून का वटवृक्ष बनाए , क्योंकि आने वाली पीढ़ी के स्वस्थ, संतुलित और सशक्त भविष्य की नींव, उसके जन्म के पहले दिन से ही माँ और पिता दोनों के हाथों से मिलकर रखी जाती है.

(लेख – ऐ आई पावर्ड). लेखक – वीरेन्द्र कुमार पालीवाल

Railhunt News Desk
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