हिंद की महारानी हैं हिंदी
आज बन-संवर पगडंडी पकड़ती
बड़ी खुश इठलाती-मचलती
गलियों,कस्बों,गांव,शहरों
हर जगह स्वागत
लोग-बाग नए-नए वादे
कर रहें ये हैं हिंदी
मेरा स्वाभिमान हैं हिंदी
अनपढ़ से शुरू होती हैं हिंदी
ज्ञानी बना कर छोड़ती हैं हिंदी
हिंदुस्तान की पहचान हैं हिंदी
पूरे विश्व में भारतीयों की
पहचान हैं हिंदी
हमारी शान हैं हिंदी
हमारा मान हैं हिंदी
जब पढ़ी जाती हैं हिंदी
मिश्री घोल जाती हैं हिंदी
भाषा नहीं भावना हैं हिंदी
अखंड भारत की आत्मा हैं हिंदी
शुद्ध सरल और उदार हैं हिंदी
अनेकता में एकता
स्थापित सूत्रधार हैं हिंदी
संस्कारित होकर रहना
सिखाती हैं हिंदी
झुक कर आशीष लेना
सिखाती हैं हिंदी
हमारा शब्द, स्वर-व्यंजन
अमिट पहचान हैं हिंदी
हमारी चेतना, वाणी का
शुभ-वरदान हैं हिंदी
अंग्रेजियत फैलाई एसी
माया कल्पित आज हैं हिंदी
महा कवि गुणगान किए
बेचारी बनी आज हैं हिंदी
जिसके बिना हिंद थम जाए
वह भाषा हैं हिंदी
गुलामी की जंजीर तोड़ने
वह हैं हिंदी
अपनों से ही परेशान हैं हिंदी
इसे एक दिन की खुशी मिली
ये हैं हिंदी
दूसरे दिन भूल जाते हैं हिंदी
भूल ही जाते हैं हिंदी
भूल ही जाते हैं हिंदी

हिंदी दिवस पर इस रचना को साहित्य मधुशाला की ऑनलाइन काव्य गोष्ठी में जमशेदपुर के प्रमोद खीरवाल की प्रस्तुति.
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