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नॉन-वेज फूड हलाल है या झटका, यह जानना यात्रियों का अधिकार, NHRC ने रेलवे से मांगी एक्शन रिपोर्ट

  • एनएचआरसी ने ट्रेनों में हलाल-सर्टिफाइड खाना परोसने के मुद्दे पर रेलवे की रिपोर्ट को बताया अधूरा

NEW DELHI. भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने ट्रेनों में हलाल-सर्टिफाइड खाना परोसने के मुद्दे पर रेलवे द्वारा सौंपी रिपोर्ट को आधा-अधूरा बताया है. आयोग ने कहा कि इस रिपोर्ट में पारदर्शिता नहीं है. एनएचआरसी ने रेलवे बोर्ड को मिली शिकायत पर नोटिस भेजकर यह जानना चाहा था कि इंडियन रेलवे नॉन-वेजिटेरियन खाने में सिर्फ़ हलाल-प्रोसेस्ड मीट परोसता है. शिकायतकर्ता ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया था. आयोग ने इस मामले में रेलवे बोर्ड से नई कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है और FSSAI व पर्यटन मंत्रालय को भी नोटिस जारी किया है.

मीडिया में आयी सूचनाओं के अनुसार आयोग की नोटिस पर रेलवे बोर्ड ने बताया कि ट्रेनों में हलाल-सर्टिफाइड खाना बेचने या परोसने का कोई आधिकारिक प्रावधान नहीं है. रेलवे और आईआरसीटीसी अपने फूड प्रोडक्ट्स के लिए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की गाइडलाइन्स का ही पालन करते हैं. इंडियन रेलवे में हलाल-सर्टिफाइड खाना परोसने का कोई आधिकारिक प्रावधान नहीं है. उपभोक्ता ने शिकायत में कहा था कि IRCTC के माध्यम से ट्रेनों में केवल हलाल मीट परोसा जा रहा है.

हाल ही में केंद्रीय माहिती आयोग (CIC) के सामने भी एक ऐसा ही मामला आया था. इसमें आवेदक ने सूचना के अधिकार कानून के तहत यह जानकारी मांगी थी कि क्या ट्रेनों में नॉन-वेज खाने में हलाल-प्रोसेस्ड मीट परोसा जाता है. रेलवे बोर्ड ने सीआईसी को बताया था कि रेलवे में हलाल-सर्टिफाइड खाना नहीं परोसा जाता है. सीआईसी ने अपने आदेश में रेलवे की बात को रिकॉर्ड किया और कहा कि चीफ प्रिंसिपल इन्फॉर्मेशन ऑफिसर ने साफतौर पर और लगातार कहा है कि आईआरसीटीसी के पास हलाल-सर्टिफाइड खाने की किसी पॉलिसी, उसकी मंजूरी की प्रक्रिया, या इस संबंध में यात्रियों से ली गई किसी साफ सहमति के बारे में कोई रिकॉर्ड या दस्तावेज मौजूद नहीं हैं.

हालांकि, NHRC ने पाया कि रेलवे द्वारा सबमिट की गई रिपोर्ट अधूरी है और इसमें पूरी बातें स्पष्ट नहीं है. यह यात्रियों की मौलिक आजादी को प्रभावित करता है. यह मौलिक अधिकार है जो व्यक्तियों को यह जानने की आजादी देता है कि वे क्या खा रहे हैं. किसी भी मांस को ‘हलाल’ माने जाने के लिए, दारुल उलूम देवबंद की व्याख्या के अनुसार, उसे एक मुस्लिम द्वारा ज़बह किया जाना चाहिए. इसमें कहा गया कि अगर ऐसा मांस ट्रेनों या आईआरसीटीसी द्वारा मैनेज किए जाने वाले प्लेटफॉर्म पर परोसा जा रहा है, तो इससे रोजगार में भेदभाव और दूसरे धर्मों के लोगों के लिए अवसरों पर रोक से जुड़ी चिंताएं भी जुड़ जाती है.

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