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आदमी आदमी क्यों नहीं बन पाता है ?

आदमी आदमी क्यों नहीं बन पाता है ?

अक्सर ये सवाल मेरे दिल में आता है ,
आदमी आदमी क्यों नहीं बन पाता है ?

उपकार कर दो तो अकड़ कर देखता है |
खुदा खुद को समझ वो बैठता सम्मान पा कर |

तिल ढूंढता है वो सदा गैरों के दामन में
पुता कालीखों से खुद का चेहरा क्यूँ छुपता है ?
अक्सर ये सवाल मेरे दिल में आता है
आदमी आदमी क्यों नहीं बन पाता है ?

उपदेश दे दो तो वो मुड़ कर बैठ जाता है |
विश्वास कर लो तो सदा वह चोट करता है

मिलती नहीं खुशियां उसे अब इस ज़माने में
खुद आग अपनों की चिता को क्यूँ लगाता है ?
अक्सर ये सवाल मेरे दिल में आता है,
आदमी आदमी क्यों नहीं बन पाता है ?

क्षमा करने की कीमत जनता ना वो कभी |
प्यार कर दो तो सदा आघात करता है |

रहमतें ताउम्र की परवाह ना करता कभी |
थोड़ी सी लालच देख के क्यूँ मुह छुपाता है ?
अक्सर ये सवाल मेरे दिल में आता है ,
आदमी आदमी क्यों नहीं बन पाता है ?

# संजय, पटना

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