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रेलनीर घोटाला में आरोपी आईआरटीएस अधिकारी एमएस चालिया और संदीप साइलस को राहत

  • हाईकोर्ट ने रेलमंत्री के प्रॉसिक्यूशन सेंक्शन आर्डर को अयोग्य करार देते हुए ट्रायल कोर्ट का निर्णय किया रद्द

नई दिल्ली. आईआरसीटीसी के रेलनीर घोटाले में दिल्ली हाईकोर्ट ने दो वरिष्ठ आईआरटीएस अहिकारी एमएस चालिया (सेवानिवृत्त) और संदीप साइलस को 15 मार्च 2019 शुक्रवार को बाइज्जत बरी कर दिया. निर्णय सुनने के दौरान हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई के लिए रेल मंत्री से लेकर चेयरमैन के खिलाफ प्रतिकूल टिपपणी भी की. यह मामला रेलमंत्री सुरेश पी प्रभु और चेयरमैन एके मितल के समय का है. मामले में पूर्व के कोर्ट के निर्णय को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि दोनों अधिकारियों के विरुद्ध प्रॉसिक्यूशन की अनुमति देते समय रेलमंत्री ने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया. ऐसे अविवेकी निर्णय को नहीं स्वीकार किया जा सकता है. एमएस चालिया और संदीप साइलस ने रेलमंत्री द्वारा सीबीआई को प्रॉसिक्यूशन की अनुमति देने के आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. दोनों अधिकारियों पर रेलवे के ‘रेलनीर’ ब्रांड को दरकिनार कर पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर की आपूर्ति करने वाली एजेंसियों को फायदा पहुंचाने व रेलवे के राजस्व को चूना लगाने का आरोप लगाया गया था.

चालिया एवं साइलस उत्तर रेलवे के सीसीएम/कैटरिंग के पद पर कार्य कर चुके है. हालांकि उत्तर रेलवे में रेलनीर का जो घोटाला सामने आया था वह दोनों के कार्यकाल से पहले का था, बावजूद तत्कालीन रेलमंत्री की पहल पर सीबीआई ने इस मामले में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत 14 अक्टूबर 2015 को प्राथमिकी दर्ज कर ली थी. प्राथमिकी दर्ज होने के बाद दोनों अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था.हालांकि सीबीआई ने रेलवे बोर्ड से पूर्व अनुमति लिए बिना ही 16 दिसंबर 2015 को दोनों अधिकारियों के विरुद्ध अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दिया था. इस दौरान रेल मंत्रालय की निलंबन पुनर्विचार समिति (सस्पेंशन रिव्यु कमेटी) ने दोनों अधिकारियों का निलंबन फैक्ट के आधार पर जारी रखने की जरूरत नहीं समझी थी. हालांकि बाद में 2 मई 2016 को सीवीसी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया था कि दोनों अधिकारियों के विरुद्ध प्रॉसिक्यूशन की अनुमति देने और विभागीय कार्रवाई जारी रखने का कोई आधार नहीं है.

बावजूद 16 जून 2016 को सीबीआई ने रेलवे बोर्ड को भेजे अपने पत्र में दोनों अधिकारियों के विरुद्ध प्रॉसिक्यूशन की अनुमति को लेकर दबाव बनाया. नतीजा यह हुआ कि 18 अक्टूबर 2016 को सीवीसी की प्रॉसिक्यूशन की अनुमति नहीं दिए जाने के बावजूद तत्कालीन रेलमंत्री सुरेश पी प्रभु ने मामले को लटकाते हुए अनुशंसा मांगी. मंत्री की टिप्पणी के बाद रेलवे बोर्ड से फिर एक बार सीबीआई और सीवीसी से एडवाइस मांगी गयी. सीवीसी ने 2 नवंबर 2016 को दिये गये पूर्व के एडवाइस पर कायम रही. मामला टलता गया और इस बीच 14 मार्च 2017 को अदालत की प्रतिकूल टिप्पणी से हड़बड़ाकर रेलमंत्री ने दोनों अफसरों के खिलाफ प्रॉसिक्यूशन की अनुमति दे दी. कोई रास्ता सामने नहीं देख दोनों अधिकारियों ने कैबिनेट सेक्रेटरी के सामने स्थिति को रखा. वहां से भी राहत नहीं मिलने के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा 1 जुलाई 2017 को दिए गए निर्णय को दोनों अधिकारियों ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी. इसमें सीवीसी की दोनों एडवाइस एवं डीओपीटी के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन को आधार बनाकर पक्ष रखा गया.

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार, 15 मार्च को दिए अपने आदेश में साफ कहा है कि प्रॉसिक्यूशन की अनुमति देने के समय रेलमंत्री ने सीवीसी की एडवाइस पर ध्यान नहीं दिया और बिना विवेक का इस्तेमाल किये उनके द्वारा किया गया यह कार्य स्वीकार्य नहीं है. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में प्रॉसिक्यूशन के आदेश को खारिज करते हुए 1 जुलाई 2017 को ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को भी रद्द कर दिया. इस तरह रेलवे के दो अधिकारियो को राहत मिल गयी है.

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