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टाटानगर : कहीं भष्मासुर न बन जाये कमजोर कड़ी माने जाने वाले ओपी यादव

  • चक्रधरपुर रेलमंडल में अब तक सबसे विवादास्पद तबादले का मामला पहुंच सकता है रेलवे बोर्ड
  • टाटानगर में स्टेशन की जगह मात्र सीआइ की कुर्सी बदलने से कई चर्चाओं ने लिया जन्म

जमशेदपुर से धमेंद्र. चक्रधरपुर रेलमंडल वाणिज्य विभाग में एक तबादला आदेश इन दिनों चर्चा के केंद्र में बना हुआ है. यह तबादला है टाटानगर के वाणिज्य निरीक्षक शंकर झा का, जिनकी कुर्सी उसी कार्यालय में तबादले के नाम पर सिर्फ बदल दी गयी है. यानि शंकर झा जिस स्टेशन पर चार साल से तैनात थे आगे भी उनकी तैनाती उसी स्टेशन पर होगी. तबादले का यह आदेश रेलमंत्री पीयूष गोयल के निर्देश पर तत्कालीन प्रिंसिपल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, विजिलेंस, रेलवे बोर्ड सुनील माथुर द्वारा संवेदनशील पदों पर लंबे समय से कार्यरत रेलकर्मियों के अविलंब अन्यत्र तबादले का आदेश (पत्र सं. 2018/वी-1/सीवीसी/5/1, दि. 30.11.2018) का उल्लंघन बताया जा रहा है.

शायद यहीं कारण है कि इसे रेलमंडल वाणिज्य विभाग का अब तक का सबसे विवादास्पद तबादला बताया जाने लगा है. इस तबादले का दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि शंकर झा को टाटानगर में फिर से उस सेक्शन का वाणिज्य निरीक्षक बनाया गया जिसमें साल 2011-12 में कांड्रा में आधुनिक कंपनी को 22 करोड़ का फायदा पहुंचाने के आरोप में उन पर कार्रवाई की गयी थी. रेलवे विजिलेंस की कार्रवाई में सीआई समेत अन्य को बतौर पनिशमेंट इंक्रीमेंट भी रोका गया था और इसी क्रम में उनका तबादला टाटा से चक्रधरपुर कर दिया गया था. शंकर झा 2012 से 2015 तक चक्रधरपुर में रहे और फिर से उन्हें वापस फरवरी 2015 में टाटा का सीआई बनाकर भेज दिया गया. चार साल बाद फरवरी 2019 में शंकर झा को फिर से घूमा फिराकर टाटा में उसी सेक्शन में बनाये रखने का क्या औचित्य हो सकता है?‍ सवाल उठता है क्या सक्षम पदाधिकारी इससे अनभिज्ञ है?

तबादले का यह आदेश रेलमंत्री पीयूष गोयल के निर्देश पर तत्कालीन प्रिंसिपल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, विजिलेंस, रेलवे बोर्ड सुनील माथुर द्वारा संवेदनशील पदों पर लंबे समय से कार्यरत रेलकर्मियों के अविलंब अन्यत्र तबादले का आदेश (पत्र सं. 2018/वी-1/सीवीसी/5/1, दि. 30.11.2018) का उल्लंघन बताया जा रहा है

रेलवे पदाधिकारियों की शंकर झा पर मेहरबानी का आलम यह रहा कि उन्हें टाटा में बनाये रखने के लिए सीआई ओमप्रकाश यादव की असमय बली ले ली गयी. ओमप्रकाश फरवरी 2017 में टाटा के ब्रांच सीआई बनाये गये थे. उन्हें निर्धारित कार्यकाल पूरा करने से पूर्व ही टाटा से हटा दिया गया. वह भी ऐसे ईमानदार सीआई को जिनके ऊपर न कोई आरोप है और न ही कोई दाग. यह महज संयोग रहा हो या भेदभाव की पराकाष्टा, पर सच है कि सीआई बनने के बाद से ओम प्रकाश को वाणिज्य विभाग के हर आला अधिकारी ने कमजोर कड़ी माना. शायद यही वजह रही कि छह साल की अवधि में ओपी यादव को हर दो साल में बदल दिया गया. उन्हें अब तक कहीं निर्धारित कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं दिया गया. हर बार किसी ने किसी को उपकृत करने के लिए ओपी यादव की बली आला अधिकारियों ने ले ली. राउरकेला और चक्रधरपुर में भी उनका कार्यकाल दो साल का ही रहा. ऐसे चर्चा रेलमंडल के वाणिज्य विभाग में होती रही है.

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लेकिन इस बार वाणिज्य विभाग में कमजोर कड़ी माने जाने वाले सीआई ओपी यादव की मजबूती और पहुंचा का अंदाजा लगा पाने में वरीय अधिकारी शायद भूल कर गये. इसका व्यापक आधार और तर्क भी है. तबादले के नाम पर दो साल में ही जिस सीआई ओपी यादव को फिर से कमजोर कड़ी मानकर टाटा से चलता कर दिया गया वह वर्तमान रेलवे बोर्ड चेयरमैन के बिरादरी से है और उनके निकट ग्रामीण बताये जाते हैं. ऐसे में सीआई ओपी यादव अगर स्वाभाविक रूप से अपने हक की आवाज उठाते है और बात सक्षम माध्यम से आगे बढ़ाते है तो रेलमंडल का यह तबादला आदेश रेलवे बोर्ड तक चर्चा का विषय बन जायेगा. ओम प्रकाश द्वारा अपनी बात ऊपर तक रखे जाने की बात भी चर्चा में है. रेलमंडल वाणिज्य विभाग में इस बात की चर्चा तेज है कि कहीं तबादले का यह आदेश ही उसे जारी करने वाले अधिकारी के लिए भष्मासूर न बन जाये !

रेलवे बोर्ड के पत्र सं. 2008/वी-1/सीवीसी/1/4, दि. 11.08.2008 के अनुसार जोनल मुख्यालय में पीसीओएम, पीसीसीएम, सीएफटीएम, सीसीओ, डिप्टी सीसीएम/क्लेम्स, कैटरिंग, एससीएम/रिजर्वेशन सहित मंडलों में सीनियर डीओएम, सीनियर डीसीएम, सीटीएम, डिप्टी सीटीएम, एरिया सुपरिंटेंडेंट, डीओएम, डीसीएम, एसीएम/रिजर्वेशन समेत सीआई व सुपरवाईजर के पद को अत्यंत संवेदनशील श्रेणी के नामांकित किया गया है.

शंकर झा पर मेहरबानी के निहितार्थ लगाये जाने लगे

रेलमंडल के वाणिज्य विभाग में कहीं भी लंबी अवधि तक कार्यकाल पूरा करने वालों में सीआई शंकर झा का नाम सबसे ऊपर है. बीते 15 साल में वे हमेशा अहम स्टेशनों पर लंबे समय तक तैनात रहे. शायद यही वजह है कि एक बार फिर उन पर की गयी मेहरबानी के निहितार्थ निकाले जाने लगे हैं. बताया जाता है कि टाटा आने से पहले सात साल तक झा राउरकेला में थे. इसके बाद तीन साल सीकेपी और निर्धारित टर्म से अधिक यानी चार साल टाटा में रहने के बाद भी सीआई शंकर झा को घुमाकर फिर से टाटा में ही रखने का क्या औचित्य हो सकता है? बताया जाता है कि शंकर झा एक बिरादरी विशेष के लोगों द्वारा परेशान किये जाने का रोना रोकर हमेशा से आला अधिकारियों की सहानुभूति हासिल करते रहे है. जबकि हकीकत इससे परे है.

कई सवाल यहां यक्ष प्रश्न बनकर रेलकर्मियों के सामने खड़े है.

आखिर सक्षम अधिकारी शंकर झा के मामले में क्यों आंखों पर पट्टी बांध लेते है ? आखिर नियम-कानून से आगे जाकर उनकी मदद क्यों की जा रही है? चार साल पूरा कर चुके शंकर झा की तबादला के नाम पर सिर्फ कुर्सी क्यों बदल दी गयी ? टाटानगर बुकिंग, पार्सल, सीएफओ में सीआई के नजदीकी एक दर्जन से अधिक कर्मचारी लंबे कार्यकाल के बावजूद तबादला सूची में क्यों नहीं आये ? किसकी अनुशंसा पर आनन-फानन में टाटानगर के सीटीआई को बदल दिया गया ?

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