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रेलवे बोर्ड के पदोन्नति नियम पर पटना हाई कोर्ट ने लगायी रोक

  • अदालत के आदेश पर बोर्ड ने नियम की मनमानी व्यख्या कर जारी किया था आरबीई 33/2018 का आदेश
  • रेलवे बोर्ड के आला अधिकारियों को जमकर खिंचाई
  • कड़ी टिप्पणी में अदालत ने कहा – ‘रेकेलिब्रेशन’ और ‘रिव्यु’ का मतलब समझें
  • नहीं तो,  सैलून के बजाय बोर्ड के बड़े हाकिमों को जनरल कंपार्टमेंट में बैठकर आने का आदेश दिया जाएगा

पटना. रेलवे में अधिकारी की पदोन्नति को लेकर अदालत द्वारा दिये गये निर्देश की अपने तरह से व्याख्या करने वाले रेलवे बोर्ड की पटना हाईकोर्ट ने नौ अप्रैल की सुनवाई में जमकर खिंचाई की है. कोर्ट के आदेश पर 5 मार्च को रेलवे बोर्ड ने नया स्थापना नियम (आरबीई 33/2018) जारी किया था. रेलवे ने सीधी भर्ती होने वाले क्लास वन आफिसर व ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी अधिकारियों की प्रोन्नति को लेकर बनाये गये इस नियम में रेलवे बोर्ड ने अदालत के आदेश की अपने स्तर से व्याख्या कर दी. सीधी भर्ती होने वाले अधिकारी की लड़ाई एफआरओए लड़ रही थी.

पटना कैट ने भी सुनवाई में सीधी भर्ती वाले अधिकारियों को प्रोन्नति में अवसर देने का निर्देश दिया था. बाद में मामले में कैट में अवमानना की रिट दायर की गयी. इसमें सुनवाई करते हुए कैट ने अपने 11 पन्ने के आदेश में मामले को खारिज कर दिया. अवमानना मामले में कैट पटना के आदेश के खिलाफ वादी आर. के. कुशवाहा ने पटना हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल की. यह याचिका युवा ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की तरफ से विद्वान अधिवक्ता एम. पी. दीक्षित ने 5 अप्रैल को दायर की. उन्होंने 6 अप्रैल को हाई कोर्ट के समक्ष ‘अर्जेंट हियरिंग’ के लिए भी निवेदन दिया, जिस पर हाई कोर्ट ने अपनी स्वीकृति दे दी और अगले कार्य-दिवस यानि 9 अप्रैल को यह सुनवाई हुई. हाईकोर्ट ने रेलवे की खिंचाई करने के साथ ही विवादित आरबीई 33/2018 पर अगली सुनवाई तक के लिए तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है.

जस्टिस अजय कुमार त्रिपाठी ने अपने आदेश और आरबीई 33/2018 में कोई तालमेल नहीं होने की बात तल्ख लहजे में कही तथा रेलवे द्वारा एन. आर. परमार मामले में सर्वोच्च अदालत के आदेश को ‘फिलॉसफी’ बताकर उसकी मनमानी व्याख्या करके कन्नी काट लेने पर रेलवे को आड़े हाथों लिया और खूब खरी-खोटी सुनाई. जस्टिस त्रिपाठी ने रेलवे के अधिवक्ता से कहा कि रेलवे के अफसरों से कहो कि ड्रॉफ्ट लेटर को साइन करने से पहले थोड़ा पढ़ भी लिया करें. उन्होंने उसी नाराजगी भरे लहजे में यह भी कहा कि शायद कैट पटना की बेंच इन बड़े सरकारी हाकिमों से डर गई होगी, यदि वह नहीं सुधरे, तो यह न्यायालय पटना जंक्शन पर उनके सैलूनों की लाइन लगवा देगा, तब रेलवे के इन सभी बड़े हाकिमों की एक लाइन से अटेंडेंस यहीं लगेगी.

इसके बाद वादी कुशवाहा के विद्वान वकील दीक्षित ने अदालत को जब यह बताया कि ‘रेलवे ने पटना हाई कोर्ट के आदेश को लिखित रूप से ‘रेकेलिब्रेशन’ के साथ अपनाने की बात कही है.’ इस पर जस्टिस त्रिपाठी ने नाराजगी जताते हुए कहा कि ‘रेलवे के इन बड़े हाकिमों को जल्द ही अदालत की भाषा में समझाना पड़ेगा कि ‘रेकेलिब्रेशन’ और ‘रिव्यु’ का मतलब क्या होता है?’ आगे न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि ‘प्रमोटी तो सिस्टम का हिस्सा होते हैं, उन्हें पता होता है कि कब, किस साहेब को कितना और कैसे तथा कितने बजे सैलूट मारना है, वह यह सब बखूबी जानते हैं, उनकी अपनी लॉबी है, जबकि यूपीएससी से आया बेचारा युवा अधिकारी तो अपने कामों में ही लगा रहता है, नया-नया आता है, उसे कुछ पता नहीं होता है.

न्यायमूर्ति त्रिपाठी ने रेलवे के अधिवक्ता को कड़ी हिदायत देते हुए यह भी कहा कि जवाब सोच-समझकर बनाईएगा, वरना अदालत द्वारा इस बार आलीशान सैलून के बजाय रेलवे बोर्ड के बड़े हाकिमों को ट्रेन के जनरल कंपार्टमेंट में बैठकर आने का आदेश दिया जाएगा. न्यायमूर्ति त्रिपाठी ने कहा कि एन. आर. परमार मामले के आदेश में सीधी भर्ती ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों को इतना दिया गया है कि वे इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. उन्होंने रेलवे के अधिवक्ता से पूछा कि जब इस अदालत ने परमार मामले में सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय के संबंधित पैरा का उल्लेख करते हुए स्पष्ट आदेश दिया था, फिर भी रेलवे बोर्ड ने वादी आर. के. कुशवाहा की वरीयता वर्ष 2007 के बजाय वर्ष 2009 में क्यों तय की? इस पर जवाब दाखिल करने के लिए रेलवे के अधिवक्ता ने चार हप्ते का समय देने की फरियाद की, जिस पर अदालत राजी हो गई.

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 13 अप्रैल को है. उसी दिन लगभग यह भी तय हो जाएगा कि अदालत का फैसला किस के पक्ष में जाएगा, क्योंकि पिछली तारीख में अदालत द्वारा दी गई कड़ी हिदायत के अनुपालन में सभी संबंधित पक्षों ने अपना-अपना जवाब यथासमय दाखिल कर दिया है. इसलिए 13 अप्रैल को अंतिम आदेश की प्रबल संभावना भी है.

आर. के. कुशवाहा ने दायर की है सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लंबित मामले में 12 दिसंबर 2017 को दिए गए अंतरिम आदेश को धता बताते हुए रेलवे बोर्ड ने 19 जनवरी 2018 को एक नया पत्र जारी कर दिया. इस नए पत्र के जरिए प्रमोटी अधिकारियों के साथ ही सीधी भर्ती ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की पदोन्नति पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, जबकि अदालत ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था. रेलवे बोर्ड के इस नए आदेश के खिलाफ आर. के. कुशवाहा ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की बेंच में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड और सेक्रेटरी/रे.बो. के विरुद्ध अवमानना याचिका दायर की है. यह याचिका मुख्य न्यायाधीश की बेंच द्वारा स्वीकार भी कर ली गई है.

प्रस्तुत मामले में सीधी भर्ती ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय में एक ही दिन में चार याचिकाएं दाखिल की हैं. मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने भी सभी मामलों को स्वीकार करते हुए सुनवाई की तारीख (5 मार्च) भी सुनिश्चित की थी.

ये चारों मामले इस प्रकार हैं-

  1.  सीआरबी, सेक्रेटरी और जॉइन्ट सेक्रेटरी/रे.बो. के खिलाफ अवमानना याचिका.
  2.  स्वयंभू बने प्रमोटी अधिकारी संगठन के नेताओं के खिलाफ अवमानना याचिका.
  3. उच्च न्यायालय, जबलपुर के क्रयित आदेश के खिलाफ एसएलपी दायर की गई है.
  4. इंटर-लोकेटरी एप्लीकेशन (आईए) के तहत विभिन्न कैट में लंबित सभी मामलों को सर्वोच्च न्यायालय में एकीकृत किए जाने की याचिका.

सीधी भर्ती ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय में प्रमोटी अधिकारी संगठन के खिलाफ भी अदालत की अवमानना याचिका दायर की है. उल्लेखनीय है कि इस मामले में मुख्य मुद्दई आर. के. कुशवाहा ने अपने एक ज्ञापन के माध्यम से तत्कालीन चेयरमैन, रेलवे बोर्ड से निवेदन किया था कि एन. आर. परमार मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को रेलवे पर भी लागू किया जाए. परंतु तत्कालीन चेयरमैन, रेलवे बोर्ड ने उनकी इस मांग को खारिज (रिजेक्ट) कर दिया था. इस रिजेक्शन के विरुद्ध उन्होंने एक मामला कैट पटना में दाखिल किया. मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने अपना आदेश रिजर्व्ड कर दिया था. इस पर पुरजोर बहस के बाद कैट/पटना का निर्णय सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के पक्ष में आया. ग्रुप ‘सी’ से पदोन्नति प्राप्त इंजिनीरिंग विभाग के पी. आर. सिंह और सिग्नल एवं दूरसंचार विभाग के आर. के. कुशवाहा की आपसी वरीयता में विभाग अलग होने की वजह से कोई मतभेद कभी नहीं था. तथापि प्रमोटी अधिकारी संगठन के पदाधिकारी होने के नाते पी. आर. सिंह प्रमोटी अधिकारी संगठन के फंड से केस लड़ने लगे.

कैट/पटना ने अपने निर्णय में भारतीय रेल में हुए इस ‘अधिकारी पदोन्नति घोटाले’ के अन्य पहलूओं को भी उजागर किया है. कैट/पटना में हारने के बाद पी. आर. सिंह ने संगठन के पदाधिकारी के नाते पटना हाई कोर्ट, पटना में रिट याचिका दाखिल की थी. इस पर लंबी बहस के बाद उन्हें पटना हाई कोर्ट में भी हार का सामना करना पड़ा था. पटना हाई कोर्ट ने मामले में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड के निर्णय को गलत और पक्षपातपूर्ण बताने के साथ-साथ भरतीय रेलवे स्थापना नियमावली (आईआरईएम) के वरीयता निर्धारण के नियम को ही त्रुटिपूर्ण करार दे दिया. इसके बाद प्रमोटी अधिकारी संगठन भागकर सर्वोच्च न्यायालय की शरण में पहुंचा. परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कैट/पटना के निर्णय की तारीख के बाद पदोन्नत हुए सभी एडहाक जेएजी प्रमोटी अधिकारियों की पदावनति का आदेश दे दिया. इसके अलावा सर्वोच्च अदालत ने प्रमोटी अधिकारी संगठन के स्टे वाली गुहार को न सिर्फ खारिज कर दिया, बल्कि दो-तीन तारीखों में सुनवाई हो चुकने के बाद भी अब तक उसकी एसएलपी को एडमिट नहीं किया है.

इसी दरम्यान कैट/पटना में चल रहे मामले में अवमानना से बचने के लिए रेलवे बोर्ड ने एडहाक जेएजी प्रमोटी अधिकारियों को रिवर्ट करने का आदेश दे दिया. इस पर सर्वोच्च न्यायालय से राहत नहीं मिलने के बाद प्रमोटी अधिकारी संगठनों और उनसे जुड़े प्रमोटी अधिकारियों ने एक रणनीति के तहत देश के लगभग सभी कैट में तथ्यों को छुपाकर कई मेल दाखिल किए. प्रमोटी अधिकारी संगठन की इस चाल को सीधी भर्ती अधिकारियों की तरफ से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने एक ही झटके में धराशायी कर दिया और एक साथ चार मामले सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करके अपनी मजबूत रणनीति का नमूना पेश किया है.

अब यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि अगली सुनवाई में अवमानना मामले पर रेल प्रशासन औए प्रमोटी अधिकारी संगठन की क्या रणनीति सामने आती है. यह तो लगभग निश्चित है कि अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में दोनों को राजनीतिक दबाव में तुगलकी निर्णय लेने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.

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