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आर्थिक रूप से गरीब सवर्णों को मिलता रहेगा 10% का आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट के पांच में तीन जजों ने निर्णय सही ठहराया

  • जस्टिस पारदीवाला ने कहा आरक्षण को अनंतकाल तक जारी नहीं रहना चाहिए, वरना यह निजी स्वार्थ में तब्दील हो जाएगा
  • आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य को EWS के तहत नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10% रिजर्वेशन के खिलाफ 2019 में दायर हुई थी याचिका  

NEW DELHI : आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के 10% आरक्षण को लेकर चल रहे कानूनी विवाद पर अंतिम निर्णय आ गया है. सुप्रीम कोर्ट की 5 न्यायाधीशों की बेंच में तीन ने EWS Reservation (आरक्षण) को संवैधानिक ढांचा का उल्लंघन नहीं माना और सरकार के निर्णय से सहमति जतायी है. वहीं चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रवींद्र भट्ट ने इसके खिलाफ फैसला सुनाया है. जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है. इससे यह तय हो गया कि इसे लेकर चल रहा कानूनी विवाद खत्म हो गया है और यह आरक्षण जारी रहेगा. मालूम हो कि CJI ललित 8 नवंबर यानी मंगलवार को रिटायर हो रहे हैं. रिटायर होने से एक दिन पहले CJI की अध्यक्षता वाली पीठ ने आरक्षण के मामले में फैसला सुनाया है.

आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग यानी EWS को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10% रिजर्वेशन देने के लिए सरकार ने जनवरी 2019 में 103वें संविधान संशोधन किया था. तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK सहित कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर इसे चुनौती दी. इसकी सुनवाई चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली 5 जजों की बेंच कर रही है.

सरकार के निर्णय को गलत ठहराते हए पांच जजों की बेच में शामिल जस्टिस रवींद्र भट ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर और गरीबी झेलने वालों को सरकार आरक्षण दे सकती है और ऐसे में आर्थिक आधार पर आरक्षण अवैध नहीं है. लेकिन इसमें से SC-ST और OBC को बाहर किया जाना असंवैधानिक है. ऐसी प्रगति बंटवारे से नहीं, बल्कि एकता से हासिल की जा सकती है. ऐसे में EWS आरक्षण केवल भेदभाव और पक्षपात है. ये समानता की भावना को खत्म करता है. ऐसे में मैं EWS आरक्षण को गलत ठहराता हूं. वहीं चीफ जस्टिस यूयू ललित ने भी जस्टिस रवींद्र भट के विचारों से सहमति जतायी थी.

हालांकि जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने अपने निर्णय में कहा कि केवल आर्थिक आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण संविधान के मूल ढांचे और समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है. आरक्षण 50% तय सीमा के आधार पर भी EWS आरक्षण मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि 50% आरक्षण की सीमा अपरिवर्तनशील नहीं है. जबकि जस्टिस बेला त्रिवेदी ने जस्टिस दिनेश माहेश्वरी के मत का समर्थन किया और कहा कि वह यह मानती हूं कि EWS आरक्षण मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं है और न ही यह किसी तरह का पक्षपात है. यह बदलाव आर्थिक रूप से कमजोर तबके को मदद पहुंचाने के तौर पर ही देखना जाना चाहिए. इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता है. इनके समर्थन में जस्टिस पारदीवाला का कहना था कि मैं यहां कहना चाहता हूं कि आरक्षण की अंत नहीं है. इसे अनंतकाल तक जारी नहीं रहना चाहिए, वरना यह निजी स्वार्थ में तब्दील हो जाएगा. आरक्षण सामाजिक और आर्थिक असमानता खत्म करने के लिए है. यह अभियान 7 दशक पहले शुरू हुआ था. डेवलपमेंट और एजुकेशन ने इस खाई को कम करने का काम किया है.

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों में से 3 जजों ने इसे सही ठहराया. जस्टिस रवींद्र भट और CJI यूयू ललित अल्पमत में रहे. इससे तय हो गया कि सामान्य वर्ग के गरीबों को दिया जाने वाला 10% आरक्षण जारी रहेगा.

#Economically_poor_upper_10%_reservation #Supreme_Court

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