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    Home » गपशप : ‘3 महीने का हरिद्वार कमबैक!’ चक्रधरपुर में SER विजिलेंस का ‘ऑपरेशन गंगाजल’ हुआ फेल!
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    गपशप : ‘3 महीने का हरिद्वार कमबैक!’ चक्रधरपुर में SER विजिलेंस का ‘ऑपरेशन गंगाजल’ हुआ फेल!

    Railhunt News DeskBy Railhunt News DeskJuly 30, 2026
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    “यहां नियम-कानून तो बस कागज़ के पंखे हैं, असली हवा तो ‘पहुंच’ से ही चलती है!”

    कहते हैं कि ‘सरकारी नियम’ और ‘विजिलेंस की रेड’ सिर्फ मन को शांति देने और दफ्तर की दीवारों को सजाने के लिए होते हैं! अगर आपको इस बात पर जरा भी शक है, तो एक बार दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर रेल मंडल की सैर कर आइए. यहां के ‘साहब’ की दरियादिली ऐसी है कि रेलवे बोर्ड के कड़े नियम-कानून भी पानी मांगते नजर आते हैं.

    गपशप गली की ताजा खबर यह है कि मंडल में ‘सेंसिटिव’ (संवेदनशील) पोस्टिंग का मतलब बदल चुका है. यहां मलाईदार कुर्सियों पर कौन बैठेगा, इसका फैसला रेलवे बोर्ड की बोरिंग रूल बुक से नहीं, बल्कि ‘विशेष कृपा’ के अनूठे पैमाने से होता है!

    3 महीने का ‘पुण्य स्नान’ और कुर्सी वापस!

    अभी हाल ही में दक्षिण पूर्व रेलवे के जोनल विजिलेंस (VIGILANCE) ने बड़ी शान से अपनी ‘तीसरी आंख’ खोली थी. लंबे समय से एक स्थान पर सालों से जमे लोगों की फाइलें खुलीं और लगभग एक दर्जन कर्मठ (या कहिए ‘कमाऊ’) चेहरों को संवेदनशील पदों से हटाकर साइड लाइन कर दिया गया.

    लेकिन साहब! चक्रधरपुर में तो ‘वापसी का जादू’ चलता है. महज तीन महीने का एकांतवास कटवाकर, उन सभी चेहरों पर ऐसा ‘गंगाजल’ छिड़का गया कि वे फिर से उन्हीं मलाईदार कुर्सियों पर पूरी शान से विराजमान हो गए! लोग तो अब यह चुटकी ले रहे हैं कि विजिलेंस की कार्रवाई सजा नहीं, बल्कि अधिकारियों के लिए ‘3 महीने का रिफ्रेशिंग मिनी-हॉलिडे’ बन चुकी है.

    विजिलेंस की अनुशंसा पर 30 लोगों की जो ट्रांसफर लिस्ट बड़ी गाजे-बाजे के साथ तैयार की गई थी, उसमें से तो एक दर्जन लोग तो अपनी कुर्सियों पर ‘रिचार्ज’ होकर फिर से वापस लौट भी आए!

    बाकी दो दर्जन से अधिक लोगों में से आधे से अधिक तो अभी तक अपनी पुरानी कुर्सियों से विरमित (Relieved) ही नहीं हुए, वे जहां थे वहीं टिके रह गए. अब क्या विजिलेंस के आदेश पर सिर्फ कुछ दबे-कुचले और गरीब रेलकर्मियों पर ही अमल में आया? बाकी पूरा का पूरा आदेश तो हवा-हवाई ही रह गया!

    लगता है यहां ‘पहुंच’ ही सबसे बड़ा ‘प्रमाण’ है, और नियम-कानून तो बस कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं. सीनियर DCM साहब के इस ‘जादू’ को देखकर तो विजिलेंस वाले भी अपना सिर खुजा रहे होंगे!

    टाटानगर में चला ‘गुड्स’ वाला जादू!

    ताजा मामला अपने अमित जी का है. बोर्ड का आदेश कहता है “पारदर्शिता बनाए रखने के लिए एक ही जगह जमे मत रहो.” लेकिन चक्रधरपुर में तो ‘भरोसे’ की परिभाषा ही अलग है. पूरे मंडल में साहब को सिर्फ कुछ चुनिंदा चेहरे ही ऐसे दिखते हैं, जो ‘काम’ (और मलाई) को बखूबी संभाल सकते हैं. लिहाजा, नियमों को ठेंगा दिखाते हुए अमित जी को ‘गुड्स का प्रभारी’ बनाकर फिर से कमान सौंप दी गई. अब इसे ‘विशेष अधिकार’ कहें या ‘अगाध प्रेम’, जनता सब समझती है!

    गार्डन रीच की मौन साधना!

    अब आप सोच रहे होंगे कि विजिलेंस के बड़े साहब (SDGM), कमर्शियल के मुखिया (PCCM) या खुद ज़ोन के सर्वेसर्वा जीएम (GM) साहब क्या कर रहे हैं?

    अरे भाई, वे सब तो ‘गार्डन रीच’ (मुख्यालय) के शांत माहौल में ध्यान-साधना में लीन हैं! जब चक्रधरपुर के सीनियर डीसीएम साहब अपने ही अंदाज में रेलवे का अलग संविधान चला रहे हैं, तो बड़े साहबों की इस ‘रहस्यमयी खामोशी’ को क्या माना जाए? सहमति या लाचारी?

    चर्चा है कि बड़े साहबों की खामोशी के बीच सीनियर डीसीएम साहब ने जाते-जाते नयी लिस्ट तैयार करवाना भी शुरू कर दिया है ताकि “स्वजन ” या “पसंदीदा कर्मचारियों” को मनपसंद सीट पर वापस भेजा जा सके.

    चलते-चलते: अगर विजिलेंस की रिपोर्ट का मोल सिर्फ तीन महीने की रद्दी जितना ही है, तो क्यों न विजिलेंस विभाग का नाम बदलकर ‘अस्थायी ट्रांसफर एडवाइजरी बोर्ड’ रख दिया जाए? कम से कम कागजों की बर्बादी तो रुकेगी!

    संबंधित खबरें देखें : 

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