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Home » कहानी कार्मिक के कुकर्मों की – “प्रतीक्षारत पोस्टिंग और वेतन भुगतान” (भाग 02)
गपशप

कहानी कार्मिक के कुकर्मों की – “प्रतीक्षारत पोस्टिंग और वेतन भुगतान” (भाग 02)

Railhunt News DeskBy Railhunt News DeskFebruary 5, 2026
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PATNA. दिनांक 23 जनवरी 2026 को इसी शीर्षक से प्रकशित कहानी में प्रतीक्षारत पोस्टिंग के खेल का जिक्र किया गया था, जिसमें बताया गया था कि पूर्व मध्य रेल में बाहर से आये हुए रेलकर्मी के पदस्थापना में क्या क्या गुल खिलाया जाता है और कैसे कैसे कुकर्म किया जाते है. कार्मिक विभाग के कर्मी भी हाड़ मांस से बने आदमी ही होते हैं पर न जाने क्यूं कर्मचारी का हित लाभ देखने वाला विभाग का कर्मी न जाने कब और कैसे असंवेदनशील हो जाता है और धीरे-धीरे आदमी से आदमखोर हिंसक प्राणी बन दूसरे रेल कर्मी का शिकार कर उसका खून पीने लग जाता है.

जंगल का हिंसक प्राणी तो एक बार में उसका काम तमाम कर देता है पर कार्मिक के आदमखोर कर्मी मारता नहीं, खून पीता है – अनवरत, धीरे-धीरे. कर्मचारी न मरता है, जीता है. कर्मचारी युवा से प्रौढ़ हो जाता है,रेल सेवा से रिटायर हो जाता है, और रिटायरर्मेंट तक उसका खून चूसा जाता है. मानवीय सम्वेदना से हीन कार्मिक विभाग से संबंधित एक घटना का विवरण आगे दिया जा रहा है.

एक युवा वर्ष 1998 में सहायक स्टेशन मास्टर के पद पर 4200 ग्रेड पे पर पूर्व मध्य रेलवे के धनबाद मंडल में नियुक्त हुआ. ईमानदार था, परिश्रमी भी. पूर्व मध्य रेलवे की सड़ी हुई व्यवस्था में अपने आत्मा को जिंदा रखने के लिए वर्ष 2004 में रेलवे बोर्ड सतर्कता विभाग में यातायात निरीक्षक विजिलेंस के रूप मे कार्य करने हेतु चला गया. वर्ष 2008 तक चार साल वहां काम किया.

यह भी पढ़ें : कहानी कार्मिक के कुकर्मों की, —-“प्रतीक्षारत पोस्टिंग” !

रेलवे बोर्ड में कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसे अपने रेलवे के कैडर में वापस कर दिया गया और 09 जून 2008 को पूर्व मध्य रेल में अपना योगदान दिया. जैसा कि कहानी के पिछ्ले अंक में बताया गया था, कार्मिक के बाबूओं का हाथ गरम नहीं किए जाने के कारण इनको पदस्थापना की प्रकिया में लटकाये रखा गया और छह महीने के भाग दौड़ बाद इनकी पदस्थापना तत्कालीन मुगलसराय मंडल में 19.12.2008 की गई.

ऐसे मामलों के पदस्थापना आदेश में सामन्यतः प्रतीक्षारत अवधि का स्पष्ट उल्लेख होता है कि कर्मी इस तिथि से पदस्थापना की तिथि तक पदस्थापना हेतु प्रतीक्षारत थे और इस अवधि का वेतन का भुगतान “प्रतीक्षारत अवधि ” मानकर किया जाए. चूंकि कर्मी सतर्कता विभाग में काम करके आए थे और इस भ्रम में थे कि उन्हें कहीं किसी बाबू और अधिकारी को पोस्टिंग हेतु रिश्वत नहीं देना पड़ेगा सो मांगने के बावजूद उसने कुकर्मी विभाग के बाबुओं और अधिकारियों का हाथ गरम नहीं किया इसलिए प्रतीक्षारत अवधि के उल्लेख को ठंडे बस्ते में यह लिखकर डाल दिया कि “कर्मचारी का दिनाँक 09.06.2008 से पत्र जारी होने तक की तिथि तक की कार्य हेतु पदस्थापना की अवधि के लिए पत्र अलग से जारी किया जाएगा.

लगभग तीन माह के उपरांत ही मार्च 2009 में उनका ट्रांसफर हाजीपुर मुख्यालय में हो गया. मुख्यालय में पदस्थापना के क्रम में न जाने कितनी फरियादें कि पर “अंधेर नगरी और चौपट राजा” के दरबार में कोई सुनवाई नहीं हुई. हार- दारकर अपने रिटायरमेंट के पूर्व इन्होंने फरवरी 2025 में तत्कालीन वरिष्ठ उपमहाप्रबंधक सतर्कता, पूर्व मध्य रेलवे को पत्र लिखकर अपनी वेदना से व्यक्त करने का असफल प्रयास किया, परंतु पूर्व मध्य रेलवे,कार्मिक की लचर व्यवस्था के आगे सतर्कता विभाग भी लाचार सिद्ध हुआ.

पूर्व मध्य रेलवे के सतर्कता विभाग की संवेदना अपने विभाग की तरह मृत साबित हुई एवं कभी अपने विभाग में कार्यरत कर्मचारी को कार्मिक के क्रुर चुंगल से न्याय दिलाने में अक्षम साबित हुआ. कर्मचारी 31. 05. 2025 को सेवा मुक्त हो गए हैं, पर उक्त छह माह की प्रतीक्षारत अवधि के वेतन का भुगतान का आदेश अभी तक जारी नहीं हुआ है.

कोई कारवाई होते न देख इन्होंने RTI के द्वारा अपने मामले के निष्पादन संबंधी जानकारी चाही पर वह भी ढाक के तीन पात साबित हुई. रेल के विकास के लिए बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, बड़ी बड़ी योजनाएं बनाई जाती है पर जिन कर्मचारियों के परिश्रम से रेल चलायमान रहती पर कर्मचारी की जिंदगी ठहरी-ठहरी सी होती है. विभाग के द्वारा शोषण, वेतन छोड़ यात्रा भुगतान के लिए पैसा, पदोन्नति के लिए पैसा, पदोन्नति पर वेतन निर्धारण करने का पैसा,अवकाश रिकार्ड, सर्विस रिकार्ड दुरुस्त रखने के लिए पैसा, और अंत में रिटायर होने के लिए पैसा.

कर्मचारी काम करे कि कार्मिक विभाग के बाबुओं का परिक्रमा करें.

कहने को विभाग में कल्याण निरीक्षक होते हैं पर ये कल्याण निरीक्षक वरीय मंडल कार्मिक अधिकारी के घर में राशन सब्जी लाने का काम करते है, कुछ तो उनके बच्चों को स्कूल भी पहुँचाते हैं और मैडम को मार्केटिंग कराने में लगे रहते हैं. और, इनका दर्शन कर्मचारी को केवल रिटायरमेंट के समय पेंशन booklet भरने के लिए होता है, वह भी एक निश्चित फीस के साथ.

इनकी भी मजबूरी है, ये साहबों के तहसीलदार होने को मजबूर हो जाते है क्योंकि इन्हें भी घर के पास की पोस्टिंग चाहिए होती है और पूर्व मध्य रेलवे के कल्याण निरीक्षक वर्षों से अपने गृह क्षेत्र में आपको मिलेंगे जिनका कार्य क्षेत्र भी उनके गांव घर के पास दिया जाता है. विभाग में कल्याण निरीक्षक की सुनी नहीं जाती, जमे जमाए बाबु इनकी सुनते नहीं और कर्मचारी का हित लाभ देखने-सुनने वाले असहाय हो जाते हैं.

चलिये, अंत में उस भुक्त भोगी कर्मचारी का नाम बता देते हैं,जिस पर ये कहानी लिखी गई है.

  • नाम- रमेश चंद्र तिवारी
  • पदनाम- TI/ODC/HQ/ECR/HJP
  • PF No 27509353112
  • रिटायर्मेंट तिथि- 31.05.2025.

उम्मीद है सम्भवतः परमवीर चक्र की तरह इन्हें भी मरणोपरांत प्रतीक्षारत अवधि के वेतन भुगतान का आदेश प्राप्त हो जाये. विशेष: पूर्व मध्य रेलवे के अधिकारी कर्मचारियों के हित में आवाज़ उठाने वाले हमारे जैसे सजग प्रहरी से क्रोधित रहते हैं, हों भी क्यों नहीं? हम जो कर्मचारियों के हित लाभ की बात को पुरजोर तरीके से उठाते हैं, जिससे कार्मिक विभाग का अनैतिक हित प्रभावित होता है. विभाग ने कभी सोचा नहीं कि जो काम उन्हें स्वयं करना चाहिए उसके लिए हमारे जैसे सजग लोगों को आवाज़ उठानी पड़ती हैं.

थोड़ा विचारिए, कर्मफल से डरिए.

सफ़र जारी है….

रंजीत मिश्रा, लेखक railwellwishers के संपादक हैं

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