- हिलसा में टावर वैगन चालक को SSE द्वारा तथाकथित पिटाई के बाद FIR वापस लेने के लिए मिल रही चेतावनी
PATNA. रेलवे में न्याय और अनुशासन का अपना ही अनोखा गणित है. अगर कोई रेलकर्मी अपनी शिकायत लेकर अधिकारियों के दरवाजे तक पहुंचता है, तो उसे न्याय की उम्मीद होती है. लेकिन क्या किसी कर्मचारी द्वारा कथित मारपीट के बाद थाने में FIR दर्ज कराना इतना बड़ा अपराध बन जाता है कि उसे न्याय के बजाय विभागीय कार्रवाई और बर्खास्तगी का डर दिखाया जाने लगे? पूर्व मध्य रेलवे (ECR) के दानापुर मंडल के हिलसा रेलवे स्टेशन परिसर से जुड़ा यह मामला गंभीर सवाल खड़े करता है.
पूर्व मध्य रेलवे (ECR) के दानापुर मंडल स्थित हिलसा स्टेशन पर टावर वैगन चालक जनार्दन कुमार के साथ SSE की मारपीट का यह मामला नया और गंभीर मोड़ ले चुका है. आरोप है कि पीड़ित चालक को न्याय दिलाने के बजाय मामले को दबाने के लिए विभाग के सभी सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) एकजुट हो गए हैं और सामूहिक रूप से दबाव बना रहे हैं.
मारपीट के बाद FIR और विभागीय दबाव
हिलसा TRD कार्यालय में कार्यरत टावर वैगन ड्राइवर जनार्दन कुमार ने SSE शिवम कुमार सिंह पर कथित तौर पर मारपीट करने का आरोप लगाया है. पीड़ित कर्मचारी ने मामले की हिलसा थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी है. अब इस मामले में पुलिस जब तक जांच शुरू करती, कहां जा रहा है कि TRD के ADEE/MKA जितेंद्र कुमार समेत अन्य अधिकारियों की ओर से पीड़ित पर FIR वापस लेने का दबाव डाला जाने लगा है. आलम यह है कि FIR वापस नहीं लेने पर SF-5 जारी करने से लेकर बर्खास्तगी तक की चेतावनी दी जा चुकी है.
स्थानांतरण कागजों पर, दबदबा मौके पर!
दिलचस्प बात यह है कि आरोपी SSE शिवम कुमार सिंह का स्थानांतरण हिलसा से आरजीएडी (RGD) के लिए पहले ही किया जा चुका है. इस संबंध में कार्यालय आदेश E/ELECT/TRD/102/25 18 फरवरी 2025 को ही जारी किया गया था लेकिन वह आज कि तिथि तक हिलसा से रिलीज नहीं हुए.
अब इस मामले में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अगर कार्य स्थल पर कोई घटना घटित होती है और सुरक्षा का मामला बनता है तो क्या पुलिस में शिकायत दर्ज कराना रेलवे सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन है? क्या SF-5 जैसे अनुशासनात्मक औजार का इस्तेमाल व्यक्तिगत प्रतिशोध या दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है? क्या स्थानांतरण आदेश सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह गए हैं?
उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग
रेलकर्मियों का कहना है कि रेलवे में सार्वजनिक सेवा व्यवस्था है. इस मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच करायी जानी चाहिए ताकि सच के साथ दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ सके. ऐसे में आरोपी SSE को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और पीड़ित को भी. अब देखना है कि इस मामले में दानापुर डीआरएम और विभाग प्रमुख इस मामले में क्या पहल करते हैं.



