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बिना सूचना समय से पहले निकली ट्रेन, उपभोक्ता अदालत ने रेलवे पर लगाया ₹32 हजार का जुर्माना, जानिए अपने अधिकार

New Delhi/Thiruvananthapuram. 

अगर ट्रेन लेट हो जाए तो यात्री अक्सर अपनी किस्मत को कोस कर रह जाते हैं, लेकिन क्या हो जब ट्रेन निर्धारित समय से 3 घंटे पहले ही स्टेशन से रवाना हो जाए? केरल में एक ऐसा ही अनूठा मामला सामने आया है, जहां समय से पहले ट्रेन चलाने और यात्री को इसकी व्यक्तिगत सूचना न देने पर उपभोक्ता अदालत ने भारतीय रेलवे को फटकार लगाते हुए भारी जुर्माना ठोका है.

यह फैसला उन सभी रेल यात्रियों के लिए बेहद अहम है जो आए दिन सेवाओं में लापरवाही का सामना करते हैं. Navbharat Times की रिपोर्ट के मुताबिक, तिरुवनंतपुरम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने याचिकाकर्ता प्रशांत कुमार पी. के पक्ष में यह ऐतिहासिक आदेश सुनाया है.

क्या था पूरा मामला?

वर्ष 2019 में शिकायतकर्ता ने मंगलुरु से तिरुवनंतपुरम लौटने के लिए 10 लोगों के साथ ‘NZM-TVC सुपरफास्ट एक्सप्रेस’ में टिकट बुक कराया था. 3 नवंबर 2019 को जब यात्री शाम 5 बजे स्टेशन पहुंचे, तो पता चला कि नॉन-मानसून टाइमटेबल लागू होने के कारण ट्रेन दोपहर 2:50 बजे ही रवाना हो चुकी थी. यात्रियों को अचानक जनरल क्लास के टिकट खरीदकर दूसरी ट्रेन से लौटना पड़ा.

उपभोक्ता फोरम में रेलवे ने दलील दी कि समय में बदलाव की जानकारी अखबारों और आधिकारिक ऐप (NTES) के जरिए दी गई थी. हालांकि, आयोग ने रेलवे के तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि रेलवे यात्रियों को व्यक्तिगत सूचना भेजने का कोई सबूत पेश नहीं कर सकी.

उपभोक्ता कानून की दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act, 2019) के तहत किसी भी सार्वजनिक या निजी सेवा प्रदाता की ओर से दी जाने वाली सेवा में खामी को ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) माना जाता है.

इस कानून के मुख्य बिंदु, जो इस मामले में लागू होते हैं:

  • सेवा पाने का अधिकार (Right to Service): सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने वाले प्रत्येक यात्री को नियत समय पर गुणवत्तापूर्ण सेवा प्राप्त करने का कानूनी अधिकार है.
  • पूर्व सूचना का उत्तरदायित्व (Duty of Information): यदि सेवा प्रदाता (जैसे रेलवे) अपनी समय सारणी या शर्तों में बदलाव करता है, तो इसकी उचित और सीधी सूचना ग्राहक तक पहुंचाना उसी की जिम्मेदारी है.
  • मानसिक उत्पीड़न का मुआवजा: असुविधा और मानसिक परेशानी के लिए हर्जाना पाना उपभोक्ता का अधिकार है. केवल मूल राशि लौटा देना ही काफी नहीं होता.

आयोग का आदेश और रेलवे पर कार्रवाई

उपभोक्ता आयोग ने रेलवे की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि यात्री अधिकारियों की मनमर्जी या दया पर निर्भर नहीं रह सकते. आयोग ने रेलवे को निम्नलिखित भुगतान करने का निर्देश दिया:

  • ₹3,784: टिकट की मूल राशि (6% वार्षिक ब्याज के साथ).
  • ₹25,000: मानसिक उत्पीड़न और असुविधा के लिए हर्जाना.
  • ₹3,000: मुकदमेबाजी का खर्च.

अदालत ने रेलवे को एक महीने का अल्टीमेटम दिया है. यदि एक महीने के भीतर भुगतान नहीं किया जाता, तो 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देना होगा. यह निर्णय यह साफ संदेश देता है कि सरकारी संस्थाएं भी उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जवाबदेही से बच नहीं सकती हैं.

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