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    Home » रेलवे का कोच सेकेंड क्लास का हो सकता है, यात्री नहीं …सुप्रीम कोर्ट का ‘मानवीय गरिमा’ पर ऐतिहासिक फैसला
    रेल यात्री

    रेलवे का कोच सेकेंड क्लास का हो सकता है, यात्री नहीं …सुप्रीम कोर्ट का ‘मानवीय गरिमा’ पर ऐतिहासिक फैसला

    Suma kumarBy Suma kumarJuly 25, 2026
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    • ऐतिहासिक वर्ग विभाजन (Class Division) पर चिंता जताई और रेलवे को अपनी शब्दावली में सुधार करने का दिया सुझाव 

    नई दिल्ली. उच्‍चतम न्‍यायालय (Supreme Court) ने ट्रेन दुर्घटना पीड़ितों और कानूनी शब्दावली में मानवीय गरिमा को निर्धारित करने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की है कि रेलवे के दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाला ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ (द्वितीय श्रेणी का यात्री) शब्द भारतीय संविधान की आत्मा के खिलाफ है. शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘क्लास’ (श्रेणी) शब्द का इस्तेमाल ट्रेन के कोच या डिब्बे के लिए होना चाहिए, इंसान या यात्री के लिए नहीं.

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने 19 पन्नों के फैसले में देश में मौजूद ऐतिहासिक वर्ग विभाजन (Class Division) पर चिंता जताई और रेलवे को अपनी शब्दावली में सुधार करने का सुझाव दिया.

    क्या है पूरा मामला?

    यह मामला वर्ष 2015 का है, जब चंद्रकांत ठक्कर नाम के व्यक्ति की चलती ट्रेन से गिरने के कारण मौत हो गई थी. मृतक की पत्नी ने मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी, लेकिन रेलवे दावे न्यायाधिकरण (RCT) और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि दुर्घटना के बाद शव के पास से कोई वैध टिकट नहीं मिला था. इसके साथ ही अदालती दस्तावेजों में मृतक को ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ संबोधित किया गया था.

    इसके खिलाफ पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां अदालत ने निचली अदालतों के आदेशों को पूरी तरह पलट दिया.

    फैसले के प्रमुख बिंदु

    • ‘क्लास’ कोच का होता है, नागरिक का नहीं: पीठ ने कहा कि भले ही ‘सेकंड क्लास’ शब्द टिकट की कीमत से जुड़ा हो, लेकिन किसी व्यक्ति को इस तरह संबोधित करना उसके नागरिक सम्मान पर चोट पहुंचाता है. हमारे देश के वर्ग-विभाजित सामाजिक इतिहास को देखते हुए किसी इंसान को ‘द्वितीय श्रेणी का नागरिक/यात्री’ कहना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) की भावना के विपरीत है.
    • टिकट न मिलना अवैध यात्रा का सबूत नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल दुर्घटना के समय शव के पास से टिकट न मिलने मात्र से किसी व्यक्ति को ‘बिना टिकट यात्री’ या अवैध यात्री नहीं मान लिया जा सकता. हादसे की अराजकता में टिकट का खो जाना या नष्ट हो जाना एक स्वाभाविक बात है.
    • पीड़ित परिवार को 8 लाख रुपये का मुआवजा: सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता (मृतक की पत्नी) को 8 लाख रुपये का मुआवजा 4 सप्ताह के भीतर प्रदान करे.

    क्यों खास है यह फैसला?

    यह फैसला केवल एक वित्तीय मुआवजे या कानूनी राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक शब्दावली में अंतर्निहित सामंती और असमानतावादी सोच पर करारा प्रहार है. सुप्रीम कोर्ट ने संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति द्वारा चुकाई गई सेवा की कीमत उसके सामाजिक या मानवीय मूल्य का निर्धारण नहीं कर सकती. ट्रेन का जनरल या सेकंड क्लास कोच कम किराए वाला हो सकता है, लेकिन उसमें सफर करने वाला नागरिक देश का ‘प्रथम श्रेणी’ का नागरिक ही है.

    Article 21 Human Dignity Indian Railways Justice Sanjay Karol Railway Claims Tribunal Second Class Passenger SUPREME COURT Supreme Court Verdict Train Accident Compensation
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    SUMA KUMAR is an experienced Digital journalist and Content Editor at Railhunt. With a keen interest in transport infrastructure, they cover the latest developments, tech updates, and policy changes in the railway sector

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