आरपीएफ इंस्पेक्टर और उनके मातहतों की तानाशाही कार्यशैली ने बल की छवि को तार-तार कर दिया है. गनीमत रही कि न्यायालय ने मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए आरपीएफ की साजिश को बेनकाब कर दिया और निर्दोष यात्री को बड़ी राहत दी.
PUNE. रेलवे सुरक्षा बल (RPF) का मूल कर्तव्य यात्रियों की सुरक्षा करना और रेलवे परिसर में कानून-व्यवस्था कायम रखना है. लेकिन जब RPF के अधिकारी ही बेलगाम हो जाये और महकमे की कमियों को छिपाने के लिए आम नागरिकों पर झूठे मुकदमे लादने लगें, तो न्याय व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
पुणे जंक्शन से एक ऐसा ही शर्मनाक मामला सामने आया है, जहां आरपीएफ इंस्पेक्टर और उनके मातहतों की तानाशाही कार्यशैली ने महकमे की छवि को तार-तार कर दिया है. गनीमत रही कि माननीय लोहमार्ग न्यायालय ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए आरपीएफ की साजिश को बेनकाब कर दिया और निर्दोष यात्री को बड़ी राहत दी. यहां RPF इंस्पेक्टर सुनील कुमार यादव हैं.
क्या है पूरा मामला?
यह पूरी घटना 9 अक्टूबर 2026 की है. पुणे जंक्शन पर आरपीएफ अधिकारियों ने मनमानी और दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई करते हुए एक यात्री के खिलाफ रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत मनगढ़ंत मामले दर्ज कर लिया. मामूली सी (नो-पार्किंग) के मामले को तूल देते हुए यात्री पर धारा 145(b) (अभद्र व्यवहार/न्यूसेंस) और धारा 146 (सरकारी कार्य में बाधा डालना) जैसी गंभीर और झूठी धाराएं थोप दीं. इस तानाशाही रवैये के कारण उस यात्री को भारी मानसिक प्रताड़ना, सामाजिक अपमान और लंबी कानूनी प्रक्रिया की मार झेलनी पड़ी.

अदालत की सख्त टिप्पणी, झूठी धाराएं खारिज
जब यह पूरा मामला प्रथम वर्ग न्यायदंडधिकारी (लोहमार्ग न्यायालय, पुणे) के समक्ष प्रस्तुत हुआ, तो अदालत ने साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन किया. न्यायालय ने अपने आदेश (दिनांक 09/10/2026) में स्पष्ट रूप से माना कि यात्री के खिलाफ लगाई गई धारा 145(b) और धारा 146 के आरोप पूरी तरह निराधार और झूठे हैं, जो अदालत में साबित नहीं हो सके.
न्यायालय ने इन दोनों फर्जी धाराओं को खारिज (Strike out) करते हुए केवल नो-पार्किंग (धारा 159) की मामूली भूल के एवज में 1000 रुपये का अर्थदंड लगाया जिसे यात्री ने स्वीकार करते हुए तुरंत जमा करा दिया गया. अदालत के इस निर्णय के बाद यह सवाल उठने लगे है कि क्या आरपीएफ अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग इस तरह करेंगे?
आरपीएफ प्रभारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
यह प्रकरण आरपीएफ के स्थानीय नेतृत्व और विशेष तौर पर आरपीएफ प्रभारी/इंस्पेक्टर की भूमिका पर बहुत बड़े और गंभीर सवाल खड़े करता है:
- निर्दोषों को फंसाने की साजिश: क्या आरपीएफ का काम अब यात्रियों की सुरक्षा करना है या फिर अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए उन पर झूठे मुकदमे लादना?
- सत्ता का दुरुपयोग: मामूली सी बात पर यात्रियों पर आपराधिक धाराएं थोपकर उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करना किस नियम के तहत सही है?
- जिम्मेदार कौन?: जब न्यायालय ने आरोपों को खारिज कर दिया है, तो क्या इस प्रकार की अवैध और तानाशाही कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को खुली छूट दी जाती रहेगी?
DG RPF इन मामलों में सख्त एक्शन की जरूरत
पुणे की घटना देखने-सुनने में सामान्य लगे लेकिन आरपीएफ जैसी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी की साख को बट्टा लगाती हैं. यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि रेलवे सुरक्षा बल की महानिदेशक (DG RPF) और उच्च अधिकारी इस मामले का स्वतः संज्ञान लें.
पुणे जंक्शन के दोषी आरपीएफ प्रभारी और संलिप्त कर्मचारियों की तत्काल पहचान की जानी चाहिए. पद के दुरुपयोग, झूठी कार्रवाई और एक नागरिक को प्रताड़ित करने के आरोप में उन पर कड़ी विभागीय एवं अनुशासनिक कार्रवाई होनी बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी कानून की आड़ में इस तरह की मनमानी करने की हिम्मत न जुटा सके.


