- बंडामुंडा रेलखंड पर डायमंड क्रॉसिंग का काम कराने के लिए लिया गया था 7 घंटे का ब्लॉक
BANDAMUNDA. दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर मंडल के बंडामुंडा रेलखंड पर हाल ही में जो हुआ, उसे देखकर तो यही लगता है कि हमारे रेलवे इंजीनियरों के लिए ‘समय’ और ‘घड़ी की सुई’ महज एक सुझाव मात्र हैं, कोई अटल नियम नहीं! ई-कैबिन के पास पॉइंट संख्या 201 और 202B पर डायमंड क्रॉसिंग लगाने का जो कारनामा हुआ है, उसने साबित कर दिया है कि प्लानिंग चाहे जितनी भी कागजी हो, असली रोमांच तो काम शुरू होने के बाद ही शुरू होता है.
साढ़े तीन गुना समय: यानी ‘7 घंटे’ बोले तो लगभग ‘दो दिन’
गुरुवार सुबह ठीक 10 बजे तकनीकी सूरमाओं ने कमर कसी कि शाम 5 बजे तक इस ब्लॉक को खत्म करके डायमंड क्रॉसिंग बिठा देंगे. जनता और ट्रेनें भी बेचारी मानकर बैठ गईं कि चलो, सात घंटे की ही तो बात है. लेकिन लगता है हमारे इंजीनियरों की घड़ियों में सात घंटे का मतलब पूरे 28 घंटे होता है! गुरुवार सुबह से शुरू हुआ यह महा-अभियान शुक्रवार दोपहर करीब 2:30 बजे जाकर थमा. यानी निर्धारित समय से सिर्फ 21 घंटे की ही तो देरी हुई, इसे भला कोई देरी कहता है? इसे तो रेलवे की भाषा में ‘रचनात्मक विस्तार’ (Creative Extension) कहना चाहिए!
गार्डनरीच तक गूंजी तालियां, यार्ड में ही सजा कारवां
इस शानदार कार्य-शैली की गूंज सीधे दक्षिण पूर्व रेलवे के मुख्यालय गार्डनरीच तक जा पहुंची है. भला हो बंडामुंडा के कैरिज एंड वैगन विभाग का, जिन्हें इस लंबी छुट्टी (ब्लॉक) का ऐसा ‘फायदा’ मिला कि उन्हें अपनी मालगाड़ियों को शेड तक खींचकर ले जाने की जहमत ही नहीं उठानी पड़ी. जब शेड पहाड़ के पास नहीं आ सकता, तो इंजीनियरों ने ठान लिया कि पहाड़ को ही शेड के पास जाना होगा, यानी कर्मचारी खुद एक्सचेंज यार्ड में बोरिया-बिस्तर लेकर पहुंचे और पटरियों के बीच ही खुले आसमान के नीचे डिब्बों की मरम्मत का लुत्फ उठाया. इसे कहते हैं ‘ऑन-द-स्पॉट’ डेडिकेशन!
तकनीकी तैयारी और समय-प्रबंधन को मिला नया आयाम
बंडामुंडा जैसे व्यस्त रेलखंड पर, जहां से मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों का तांता लगा रहता है, ऐसे कारनामे वाकई इंजीनियरिंग विभाग की दूरदर्शिता पर चार चांद लगा देते हैं. अब सवाल उठाने वाले भला क्या जानें कि इतनी लंबी प्लानिंग के पीछे कितना मानसिक तनाव और चाय-नाश्ते का दौर चला होगा.
फिलहाल रेलवे प्रशासन की तरफ से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है, शायद वे खुद इस बात की कैलकुलेशन में जुटे हैं कि 7 को 28 से गुणा करने पर गणित का कौन सा नया फॉर्मूला बनता है. उम्मीद है भविष्य में ऐसे तकनीकी कार्य इतने ‘विस्तृत’ समयसीमा में किए जाएंगे कि रेल विभाग के बाकी कर्मचारियों को भी खुले आसमान के नीचे काम करने का रोमांच बार-बार मिलता रहे!
रिपोर्ट देव कुमार देव


