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सेवानिवृत्ति के आधार पर मुआवजा कम नहीं होगा, सरकारी कर्मचारियों के लिए मील का पत्थर होगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला

नई दिल्ली/जबलपुर. सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले या गंभीर रूप से घायल होने वाले सरकारी कर्मचारियों और उनके आश्रितों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सेवानिवृत्ति (Retirement) के आधार पर या पेंशन मिलने के कारण दुर्घटना क्षतिपूर्ति (मुआवजा) की राशि में किसी तरह की कटौती नहीं की जा सकती. अदालत का यह आदेश सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों के संरक्षण के मामले में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा.

क्या है पूरा मामला

यह मामला मध्य प्रदेश के मंडला जिले के मोहगांव निवासी उद्यान अधिकारी विश्राम सिंह से जुड़ा है. 7 मार्च 2018 को एक अनियंत्रित कार की टक्कर से उनकी दर्दनाक मौत हो गई थी.

  • निचली अदालत और हाईकोर्ट का रुख: मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने पीड़ित परिवार को 36.59 लाख रुपये का मुआवजा तय किया था. जब मामला जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचा, तो हाईकोर्ट ने क्षतिपूर्ति की मूल गणना 72.06 लाख रुपये की, लेकिन सेवानिवृत्ति और पारिवारिक पेंशन को आधार बनाते हुए मुआवजा घटाकर 52.16 लाख रुपये सीमित कर दिया.

  • सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए पूरी 72.06 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति राशि (ब्याज सहित लगभग 1 करोड़ रुपये) पीड़ित परिवार को देने का आदेश दिया.

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  1. सेवानिवृत्ति का अर्थ आय का अंत नहीं: शीर्ष अदालत ने सरला वर्मा और प्रणय सेठी मामलों के कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने पर व्यक्ति की आय शून्य मान ली जाए.

  2. भविष्य की संभावनाएं: कोर्ट ने कहा कि यह मान लेना पूरी तरह गलत है कि कोई व्यक्ति सेवानिवृत्ति के बाद अपनी पसंद का दूसरा कार्य या व्यवसाय नहीं कर सकता.

  3. पारिवारिक पेंशन का गणित अलग: पेंशन मिलने के आधार पर क्षतिपूर्ति की राशि को कम करना कानूनी रूप से न्यायसंगत नहीं है.

क्यों है यह फैसला मील का पत्थर

यह फैसला देशभर के लाखों सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए राहत की बड़ी किरण बनकर आया है. अक्सर देखा जाता था कि बीमा कंपनियां और निचली अदालतें सेवानिवृत्ति की उम्र या पेंशन का हवाला देकर मुआवजे की राशि घटा देती थीं. सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से अब यह स्पष्ट हो गया है कि किसी कर्मचारी का जीवन और उसकी कार्यक्षमता केवल उसकी सरकारी नौकरी तक सीमित नहीं है, जिससे भविष्य में सड़क दुर्घटनाओं के दावों में पीड़ितों को पूरा और उचित न्याय मिल सकेगा.

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