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Home » राजनीति के ‘मौसम वैज्ञानिक रामविलास’, जिन्होंने बतौर रेलमंत्री बदल दी भारतीय रेलवे की तस्वीर
अभिमत

राजनीति के ‘मौसम वैज्ञानिक रामविलास’, जिन्होंने बतौर रेलमंत्री बदल दी भारतीय रेलवे की तस्वीर

Railhunt News DeskBy Railhunt News DeskJuly 5, 2026
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रामविलास पासवान कीके 80वें जन्मदिन पर विशेष  

  • 5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया जिले के सुदूर ‘शहरबन्नी’ गांव में जन्मे रामविलास पासवान की अनकही दास्तां 
  • 1977 में हाजीपुर लोकसभा सीट से रिकॉर्ड 4 लाख 24 हजार से ज्यादा वोटों से जीतकर ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ बनाया था

SANJAY KUMAR

PATNA. भारतीय राजनीति में कई नेता आए और गए, लेकिन रामविलास पासवान जैसा ‘किंगमेकर’ और जननेता सदियों में एक बार जन्म लेता है. विचारधाराओं की दीवारें चाहे जो भी रही हों, लुटियंस दिल्ली की सत्ता की चाबी हमेशा इस कद्दावर दलित नेता के इर्द-गिर्द ही घूमती रही.

राजनीति की हवा को भांपने की गजब की शक्ति के कारण उन्हें ‘मौसम वैज्ञानिक’ कहा जाता था, लेकिन वे सिर्फ हवा का रुख भांपने वाले नेता नहीं थे, वे जिस भी मंत्रालय में रहे, वहां उन्होंने विकास की ऐसी अमिट इबारत लिखी जिसका लोहा उनके धुर विरोधी भी मानते हैं. खासकर, 1996 से 1997 के बीच देश के रेलमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय रेलवे के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज है.

शहरबन्नी की बाढ़ से रेल मंत्रालय के गलियारों तक

5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया जिले के सुदूर ‘शहरबन्नी’ गांव में जन्मे रामविलास पासवान का बचपन भारी मुफलिसी में बीता. कोसी और बूढ़ी गंडक की विनाशकारी बाढ़ के बीच वे तैरकर या नाव के सहारे स्कूल जाने को मजबूर थे. लेकिन पढ़ाई की ललक ने उन्हें पटना यूनिवर्सिटी से एमए और एलएलबी तक पहुंचाया.

उन्होंने बीपीएससी (BPSC) की परीक्षा पास कर डीएसपी का पद भी हासिल कर लिया था, लेकिन समाज सुधार की आग ऐसी थी कि उन्होंने सरकारी नौकरी को लात मारकर सड़कों का संघर्ष चुना.

1977 में हाजीपुर लोकसभा सीट से रिकॉर्ड 4 लाख 24 हजार से ज्यादा वोटों से जीतकर ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ बनाने वाले पासवान जब 1996 में देश के रेलमंत्री बने, तो उन्होंने रेलवे को आम आदमी और शोषितों की जीवनरेखा बनाने का संकल्प लिया.

रेलमंत्री के रूप में वो फैसले, जिन्होंने रचा इतिहास

बतौर रेलमंत्री रामविलास पासवान ने कुछ ऐसे क्रांतिकारी निर्णय लिए, जिसने रेलवे का ढांचा और दिशा दोनों बदल दी थी.

हाजीपुर में पूर्व मध्य रेलवे (ECR) मुख्यालय: बिहार के पिछड़ेपन को दूर करने और रेलवे के विकेंद्रीकरण के लिए उन्होंने हाजीपुर में पूर्व मध्य रेलवे का जोनल मुख्यालय खुलवाया. यह फैसला उत्तर भारत, खासकर बिहार के विकास में मील का पत्थर साबित हुआ.

दलितों और पिछड़ों को रोजगार: पासवान जी ने अपने कार्यकाल के दौरान रेलवे के दरवाजों को समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए खोल दिया. उनके समय में रेलवे में हजारों दलितों, पिछड़ों और वंचितों को सरकारी नौकरियां मिलीं, जिससे लाखों परिवारों का जीवन स्तर सुधरा.

कुली और गैंगमैन के मददगार: वे जमीन से जुड़े नेता थे, इसलिए रेलवे स्टेशनों पर पसीना बहाने वाले कुलियों और पटरियों को संभालने वाले गैंगमैन की समस्याओं को उन्होंने करीब से समझा और उनके कल्याण के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की.

जनकल्याण की राजनीति और ’12 जनपथ’ का लंगर

पासवान सिर्फ रेल मंत्रालय तक ही सीमित नहीं रहे. 1989 में वीपी सिंह सरकार में श्रम मंत्री रहते हुए उन्होंने ‘मंडल कमीशन’ लागू करवाने में अहम भूमिका निभाई और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ दिलवाया. बाद के वर्षों में संचार मंत्री रहते हुए उन्होंने मोबाइल कॉल दरें सस्ती कीं, तो मोदी सरकार में खाद्य मंत्री के रूप में ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ की शुरुआत कर करोड़ों प्रवासी मजदूरों को भुखमरी से बचाया.

राजनीति से इतर, दिल्ली का उनका सरकारी आवास ’12 जनपथ’ दशकों तक बिहार और देशभर के गरीबों, मरीजों और छात्रों के लिए एक आश्रय स्थल बना रहा, जहां हर वक्त सैकड़ों लोगों के लिए खाना बनता था.

विरासत जो आज भी जिंदा है

साल 2020 में भले ही इस महान नेता ने दुनिया को अलविदा कह दिया और सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘पद्म भूषण’ से नवाजा, लेकिन उनकी विरासत आज भी उनके बेटे और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के रूप में जिंदा है. रामविलास पासवान का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो नदी तैरकर स्कूल जाने वाला एक साधारण लड़का भी देश की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल सकता है.

(यह लेखक के निजी विचार हैं इससे रेलहंट टीम की सहमति आवश्यक नहीं है.)

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