रवि बाबू जैसे लोग इतिहास रचने के लिए पैदा होते हैं. रवि जी ने बुकिंग क्लर्क के तौर पर डिवीजन के कार्यालय में ही शुरुआत की, फिर सीनियर बुकिंग क्लर्क, हेड बुकिंग क्लर्क, कामर्शियल सुपरिटेंडेंट से तरक्की पाते-पाते एक ही जगह 4800 ग्रेड पे तक का प्रमोशन पा लिया, लेकिन कभी बुकिंग काउंटर का मुंह तक नहीं देखा.
दुनिया में लैला-मजनू, हीर-रांझा और रोमियो-जूलियट के प्यार की दास्तानें तो आपने बहुत सुनी होंगी, जिन पर सदियों से किताबें लिखी जा रही हैं. लेकिन जनाब, ज़रा रुख कीजिए दक्षिण पूर्व रेलवे (SER) के चक्रधरपुर (CKP) मंडल की ओर, जहां प्यार की एक ऐसी अनूठी और अमर कहानी रची जा रही है जिसके आगे इतिहास के सारे प्रेमी पानी भरते नजर आएं.
यहां बात किसी लैला या मजनू की नहीं, बल्कि हमारे बेहद ‘चहेते’ और ‘महिमामयी’ कर्मचारी रवि जी और उनकी विभागीय कुर्सी के बीच के अटूट रिश्ते की हो रही है. इन दोनों के बीच जो ‘फेविकोल का मजबूत जोड़’ है, उसने साबित कर दिया है कि कुर्सियां तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन असली साम्राज्य तो वही है जो एक बार कब्जा लिया जाए!
नियम और कानून तो महज़ कागजी घोड़े!
रेलवे बोर्ड ने भी नासमझी में एक नियम बना डाला था. बड़ा सोच-समझकर नियम बनाया गया था कि जो भी कर्मचारी सीधे पब्लिक डीलिंग या किसी संवेदनशील पद पर बैठा है, उसका हर चार साल में ट्रांसफर कर दिया जाएगा. मकसद बिल्कुल सीधा और साफ था, भ्रष्टाचार के दीमक को पनपने से रोकना.
लेकिन, हमारे सिस्टम के सूरमा यह भूल गए कि नियम सिर्फ निरीह कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए होते हैं, जबकि रवि बाबू जैसे लोग इतिहास रचने के लिए पैदा होते हैं. रवि जी ने बुकिंग क्लर्क के तौर पर डिवीजनल कार्यालय से सेवा की शुरुआत की, फिर सीनियर बुकिंग क्लर्क, हेड बुकिंग क्लर्क, कामर्शियल सुपरिटेंडेंट से तरक्की पाते-पाते उसी जगह 4800 ग्रेड पे तक का प्रमोशन पा लिया, लेकिन कभी बुकिंग काउंटर का मुंह तक नहीं देखा. अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने संवेदनशील श्रेणी में दर्ज कैटरिंग और टेंडर की फाइल ही देखी व भी सालों साल.
पद बदलते गए, रुतबा आसमान छूने लगा, लेकिन न तो वह कमरा बदला, न कामर्शियल विभाग की हवा बदली और न ही वह कुर्सी अपनी जगह से टस से मस हुई! ट्रांसफर की फाइलें जब भी इस विभाग की दहलीज पर आती हैं, तो वे वैसे ही दम तोड़ देती हैं जैसे चिलचिलाती धूप में बर्फ पिघल जाती है. इसे ही कहते हैं, अपनी कार्यस्थली के प्रति ‘सच्ची और अचल निष्ठा’! इस विभाग के प्रमुख है श्री मान आदित्य चौधरी, जिनकी निगहबानी में तबादलों में भ्रष्टाचार की अनोखी पटकथा रेलमंडल में लिखी जा रहीं. डीआरएम साहब ने भ्रष्टाचार रोकने का संकल्प तो ले रखा है लेकिन मौन साधना में हैं.
डिवीजन में विभाग के प्रमुख है श्री मान आदित्य चौधरी, जिनकी निगहबानी में तबादलों में भ्रष्टाचार की अनोखी पटकथा रेलमंडल में लिखी जा रहीं. डीआरएम साहब ने भ्रष्टाचार रोकने का संकल्प तो ले रखा है, एक्शन में भी आते है लेकिन यहां मौन साधना में हैं.
शिकायत करने की गुस्ताखी? ज़रा संभल के!
अब आप सोच रहे होंगे कि क्या इस ‘अचल संपत्ति’ को हिलाने की किसी ने कभी हिम्मत नहीं की? अरे हुजूर, कोशिशें तो कई बार हुईं! जांबाज लोगों ने शिकायतें भी कीं, सबूतों के पुलिंदे भी जोड़े और बड़े-बड़े साहबों के दरबार में हाजिरी भी लगाई.
लेकिन यहां सिस्टम का सॉफ्टवेयर इतना एडवांस है कि जैसे ही कोई शिकायत बाहर आती है, रवि बाबू की महिमा से सबसे पहले शिकायतकर्ता को ही ‘चिन्हित’ कर लिया जाता है. इसके बाद शुरू होता है असली तांडव, यानी ‘ऑपरेशन बेवजह परेशानी’. अब चाहे टेंडर में मैनुपूलेशन कराना हो, टेंडर की फाइल बढ़ाना हो या टेंडर मैनेजमेंट और बिलिंग से जुड़ा कोई छोटा-मोटा काम निकलवाना हो, शिकायतकर्ता को प्रेम से अहसास करा दिया जाता है कि बेटा! सरकारें बदल सकती हैं, रेलवे के नियम बदल सकते हैं, लेकिन कामर्शियल में टेंडर विभाग के ‘डॉन’ को चुनौती देने का अंजाम क्या होता है, यह अच्छी तरह समझ लो.
जब पूरा कुआं ही भांग से भरा हो…
सवाल सबसे बड़ा यह उठता है कि आखिर रेलवे बोर्ड के नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाने की यह ताकत आती कहां से है? इसका जवाब बड़ा सीधा है, जब पूरा चक्रधरपुर मंडल ही इस ‘महिमा’ के रंग में रंगा हो, तो अकेले रवि बाबू को क्यों कोसा जाए? जब गंगा ही उल्टी बहने लगे, तो कामर्शियल विभाग के इस तालाब में नियमों की नाव भला कैसे तैर सकती है? हाल बेहाल है बड़बिल से आदित्यपुर और टाटा तक.
अधिकारी आते हैं, अपनी गाड़ियां घुमाकर चले जाते हैं, सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन रवि बाबू जैसे लोग ‘तस से मस’ नहीं होते. वे रेलवे ट्रैक के उस मील के पत्थर की तरह हैं जो खुद अपनी जगह से कभी नहीं हिलता, बस आने-जाने वालों को रास्ता दिखाता रहता है और कभी-कभी अपनी मर्जी से रास्ता भटका भी देता है.
एक अनूठी मांग
इस महान नजारे को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है कि रेलवे प्रशासन को चाहिए कि वह रवि जी जैसे डिवीजन में एक ही स्थान पर सालों से जमे लोगों को ‘सदाबहार कर्मचारी पुरस्कार’ से नवाजे और उनकी उस कुर्सी को ‘राष्ट्रीय धरोहर’ घोषित कर दे! जहां चार साल का नियम दम तोड़ देता है, वहां वर्षों का यह बेमिसाल साम्राज्य वाकई किसी उच्च स्तरीय शोध का विषय है.
नियम तो आते-जाते रहेंगे… लेकिन रवि बाबू और उनका यह सिस्टम अमर रहेगा… और कहानी जारी रहेगी.
रेलहंट का प्रयास है कि सच रेल प्रशासन के सामने आये. ऐसे में अगर किसी को यह लगता है उसकी बात नहीं सुनी जा रही है तो वह अपना पक्ष whatsapp 9905460502 पर भेज सकते है, उस पर तत्परता से संज्ञान लिया जायेगा.


